विजयादशमी, नैतिक संकल्प न्यायपूर्ण, संवेदनशील तथा मानवीय बनाने की प्रेरणा देने वाला पर्व
लक्ष्मणगढ़ (अलवर/कमलेश जैन) भारतीय संस्कृति की विशिष्टता इस बात में निहित है कि वह अपने पर्वों के माध्यम से केवल अतीत की स्मृतियों को संजोती ही नहीं, बल्कि उन्हें वर्तमान जीवन के मूल्यों और भविष्य की आकांक्षाओं से भी जोड़ती है। विजयादशमी ऐसा ही एक पर्व है, जिसकी गूंज पौराणिक आख्यानों से लेकर लोक जीवन तक सुनाई देती है। और जिसका संदेश युगों की सीमाओं को पार कर मानव चेतना को प्रेरित करता है। यह पर्व भगवान राम की रावण पर विजय और देवी दुर्गा द्वारा महिषासुर के संहार की स्मृति के साथ धर्म, शक्ति, मर्यादा और न्याय की स्थापना का प्रतीक है। इसके भीतर निहित संदेश केवल किसी पौराणिक युद्ध की परिणति तक सीमित नहीं, है बल्कि मनुष्य के अंतर्मन में सत्य और असत्य, विवेक और अहंकार तथा सदाचार और दुराचरण के बीच निरंतर चलने वाले संघर्ष को भी उजागर करता है।
आज आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनायें जाने वाला विजयादशमी का पर्व भारतीय इतिहास, धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक विविधता और आध्यात्मिक चिंतन का अद्भुत संगम है। विभिन्न क्षेत्रों में रामलीला, रावण दहन, दुर्गा प्रतिमा विसर्जन, शस्त्र पूजा और लोक देवताओं के समागम जैसी परंपराएं इसके बहुआयामी स्वरूप को सामने लाती हैं। इन विविध अभिव्यक्तियों के केंद्र में एक साझा भावना विद्यमान है।अन्याय का प्रतिकार, शक्ति का सदुपयोग और जीवन में सद्गुणों की प्रतिष्ठा। इस दृष्टि से विजयादशमी केवल उत्सव का अवसर नहीं, बल्कि आत्ममंथन, नैतिक संकल्प और समाज को अधिक न्यायपूर्ण, संवेदनशील तथा मानवीय बनाने की प्रेरणा देने वाला पर्व है।
परंपरा के साथ पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी
हालांकि उत्सव के आयोजन में पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी भी आवश्यक है। रावण दहन और आतिशबाजी से वायु प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण तथा कचरे की समस्या पैदा हो सकती है। प्रतिमाओं के निर्माण और विसर्जन में पर्यावरण अनुकूल सामग्री का उपयोग, सार्वजनिक स्थानों की स्वच्छता और सुरक्षित आयोजन की व्यवस्था इस पर्व को अधिक जिम्मेदार बना सकती है। परंपरा का सम्मान करते हुए समय के अनुसार सकारात्मक बदलाव अपनाना भी सांस्कृतिक चेतना का हिस्सा है। विजयादशमी का एक महत्वपूर्ण संदेश यह भी है कि समाज में अच्छाई की स्थापना केवल किसी एक व्यक्ति या शक्ति के प्रयास से नहीं होती। इसके लिए सामूहिक सहयोग, संवाद, न्याय और संवेदना आवश्यक हैं।
दशहरा का पर्व दस प्रकार के पापों- काम, क्रोध, लोभ, मोह मद, मत्सर, अहंकार, आलस्य, हिंसा और चोरी के परित्याग की सद्प्रेरणा प्रदान करता है।
राम की मर्यादा और मां दुर्गा की शक्ति का संदेश
विजयादशमी भारतीय संस्कृति का ऐसा पर्व है, जिसमें पौराणिक कथाएं, ऐतिहासिक परंपराएं, धार्मिक आस्था और सामाजिक जीवन एक साथ दिखाई देते हैं। भगवान राम की रावण पर विजय धर्म और मर्यादा की स्थापना का संदेश देती है, जबकि देवी दुर्गा की महिषासुर पर विजय शक्ति, साहस और न्याय का प्रतीक है। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में इस पर्व के अलग-अलग स्वरूप इसकी सांस्कृतिक विविधता को सामने लाते हैं। विजयादशमी की वास्तविक सार्थकता केवल रावण दहन, प्रतिमा विसर्जन या उत्सव की भव्यता में नहीं, बल्कि उन मूल्यों को जीवन में अपनाने में है, जिनका यह पर्व प्रतीक है। अहंकार पर विनम्रता, अन्याय पर न्याय, भय पर साहस और अज्ञान पर विवेक की विजय ही इसकी व्यापक प्रेरणा है। जब यह संदेश व्यक्ति के आचरण, सामाजिक संबंधों और सार्वजनिक जीवन में दिखाई देता है, तब विजयादशमी केवल एक वार्षिक उत्सव नहीं रहती, बल्कि बेहतर समाज के निर्माण का संकल्प बन जाती है।

