जालोर डाकघर घोटाला: 441 खातों से करोड़ों के गबन में सीबीआई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, मुख्य आरोपी को 7 साल की सजा और 1.49 करोड़ जुर्माना
जालोर/जोधपुर: जालोर के औद्योगिक क्षेत्र उप-डाकघर में 441 खातों से करोड़ों रुपए के चर्चित गबन के तीन मामलों में जोधपुर महानगर सीबीआई कोर्ट ने आखिरकार ऐतिहासिक फैसला सुना दिया है। पीठासीन अधिकारी भूपेन्द्र कुमार सनाढ्य की अदालत ने मुख्य साजिशकर्ता और पूर्व पोस्टल एजेंट रमेश कुमार गहलोत को दोषी करार देते हुए 7 साल के कठोर कारावास और कुल 1.49 करोड़ रुपए के भारी जुर्माने की सजा सुनाई है। मामले में फोरेंसिक जांच और फिंगरप्रिंट रिपोर्ट के जरिए फर्जी अंगूठे और हस्ताक्षर कर इस बड़े वित्तीय घोटाले को अंजाम देना पूरी तरह साबित हुआ है।
कैसे दिया गया था घोटाले को अंजाम? अभियोजन पक्ष के अनुसार, एजेंट रमेश कुमार गहलोत (एजेंसी कोड 760) अपनी पत्नी हेमलता के नाम पर आवंटित महिला प्रधान बचत योजना एजेंसी का संचालन खुद ही संभालता था। उसने तत्कालीन उप डाकपाल गणपतसिंह देवड़ा के साथ मिलकर सैकड़ों आरडी (RD) और एमआईएस (MIS) खाताधारकों के फर्जी आहरण पत्र तैयार किए। डाकपाल ने बिना मूल हस्ताक्षरों का मिलान किए इन फर्जी निकासियों को धड़ल्ले से मंजूरी दे दी। खास बात यह है कि घोटाले की भनक लगते ही तत्कालीन उप डाकपाल ने अपनी गलती मानते हुए 35 लाख रुपए डाकघर में वापस भी जमा करवा दिए थे, जिनकी ट्रायल के दौरान मौत हो चुकी है।
एफएसएल रिपोर्ट और अदालत की सख्त टिप्पणी अदालत में पेश एफएसएल और फिंगरप्रिंट विशेषज्ञों की रिपोर्ट में यह साबित हुआ कि शातिर एजेंट ने अनपढ़ खाताधारकों के आहरण पत्रों पर खुद ही दाएं और बाएं हाथ के अंगूठे लगा दिए थे और कई खातों में नाम बदलकर फर्जी हस्ताक्षर किए थे।
बचाव पक्ष ने दलील दी थी कि लोक सेवक उप डाकपाल की मौत के बाद अकेले निजी एजेंट को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत सजा नहीं दी जा सकती। हालांकि, अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए इस दलील को खारिज कर दिया और कहा कि सह-साजिशकर्ता की मृत्यु मात्र से जीवित आरोपी का अपराध समाप्त नहीं हो जाता।
तीन मामलों में इतने खातों से गबन साबित सिरोही मंडल के तत्कालीन डाकघर अधीक्षक की शिकायत और विभागीय ऑडिट के आधार पर सीबीआई ने तीन अलग-अलग एफआईआर दर्ज की थीं, जिनमें अदालत ने निम्नलिखित गबन साबित माना:
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पहला केस (सेशन केस 02/2015): 5 एमआईएस और 41 आरडी यानी कुल 46 खातों से 5,41,741 रुपए का गबन।
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दूसरा केस (सेशन केस 03/2015): 4 एमआईएस और 68 आरडी यानी कुल 72 खातों से 14,86,734 रुपए का गबन।
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तीसरा केस (सेशन केस 06/2015): 323 आरडी खातों से 1,34,32,537 रुपए का सबसे बड़ा गबन साबित हुआ।
अदालत ने आरोपी को राजकोष को भारी नुकसान पहुंचाने और फर्जी दस्तावेज तैयार करने का दोषी माना, जिसके बाद यह कड़ा न्यायिक फैसला सामने आया है।

