जलीय प्रबंधन ही बढ़ा रहा जल समस्या, बढ़ती पानी किल्लत को लेकर पैदा हो रहें आपसी टकराव

जलीय प्रबंधन ही बढ़ा रहा जल समस्या, बढ़ती पानी किल्लत को लेकर पैदा हो रहें आपसी टकराव

जल के प्रबंधन को लेकर भारतीय व्यवस्था बहुत ही सुंदर व विश्व की सबसे पुरानी व्यवस्था रही , हजारों वर्षों से भारत में जोहड़ , तालाब , बांध बनाने की संस्कृति भारतीय शास्त्रों में  जलीय प्रबंधन की शिक्षा देती है, जल प्रबंधन की इस व्यवस्था को संस्कृति के साथ साथ संस्कारों से भी जोड़ा गया जो विश्व की महानतम जलीय व्यवस्थाओं में से एक रही है , लेकिन पिछले पांच दशकों में भारतीय जल प्रबंधन व्यवस्था के साथ-साथ विदेशी जलीय व्यवस्थाओं को समायोजित कर यहां की जल प्रबंधन व्यवस्था को एक कुप्रथा के रूप में सामने लाकर खड़ा किया गया, जिससे चारों ओर जल को लेकर एक समस्या खड़ी हो गई। भारत की भौगोलिक परिस्थितियां अन्य देशों की बजाज एक विचित्र प्रकार की हैं जहां जल का प्रबंधन अलग तरह से होना स्वाभाविक है। यहां वर्षा ऋतु के अंदर जल को भूगर्भ में संग्रहित करने के साथ पेयजल व सिंचाई के लिए नदीयों, नालों  पर अवरोध बनाकर रोका जाता , जो सार्थक रहे हैं, लेकिन वर्तमान में यहां बनाए जा रहे पक्के एनीकट , चेक डैम, बांध ये सभी यहां की व्यवस्थाओं के विपरीत हैं, गर्म प्रदेशों में इस प्रकार का बांध बनाया जाना जलीय व्यवस्थाओं के साथ में छेड़छाड़ करना है। 
ठन्डे व गर्म प्रदेशों में पानी को संग्रह करने के उद्देश्य समान नहीं होते, अमेरिका, इंग्लेंड, जापान, चीन, भारत, अथवा किसी अन्य देश की भौगोलिक व  जलीय परिस्थितियों का गहनता से अध्ययन किया जाए तो पाया जाता है कि कहीं पानी से बनी आपदाओं से निपटने के लिए उसे रोका जाता रहा है तो कहीं अकाल,दुकाल,त्रिकाल से बचने के लिए जल को संग्रहित किया गया। ठंडे देशों, प्रदेशों में पानी को इसलिए रोका या विभाजित किया जाता है कि वह कही तबाही नहीं मचा दे और उसे रोकने के लिए पक्के डेम बना कर रोका या बहाव क्षेत्र से विभाजित किया जाता है, जबकि भारत जैसे गर्म देशों व प्रदेशों  मे पानी के संकट से उबरने के लिए संग्रहित किया जाता रहा है। ठन्डे प्रदेशों व देशों में पानी बहुतायत में होता है वही गर्म प्रदेशों में इसकी कमी हमेशा जाहीर होती रही, पानी की कमी की पूर्ति के लिए यहां कच्चे जोहड़, तालाब, बांध बनाए जाते रहे जिनसे भु गर्भ में पानी की बढ़ोतरी होने के साथ ही वर्ष भर पानी पीने, सिंचाई करने, पशु धन के उपयोग के लिए काम लिया जाता रहा । पक्के डेम जो यहां बनाए गए वे परिस्थितियों के विपरित होने के साथ ही एक समय बाद भु गर्भीय जल स्तर को बढ़ाने में अनुपयोगी बन जाने के साथ इनका 30 से 40 प्रतिशत पानी पढ़ते तापमान के साथ वाष्प बनकर तालाब से नष्ट हो जाता है वहीं इतना ही पानी प्रवाह क्षेत्र के विपरित अपना रास्ता बना कर भु गर्भीय जल संरचनाओं को प्रभावित करने में मददगार हो कर पानी की समस्या को और ज्यादा बढ़ा देता है। वर्तमान में यहां जोहड़ नष्ट हो रहें हैं, साथ ही जों बनाएं जा रहें हैं उनमें किसी भी प्रकार की आवश्यकताओं को ध्यान में नहीं रखा जा रहा जो अनुपयोगी साबित हो रहें हैं।
वर्तमान में बनाएं इन अवरोधों से नदियां सुखने के साथ इनका प्रवाह क्षेत्र प्रभावित हो रहा है, जिससे भु गर्भीय जल संरचनाओं में बदलाव आने के साथ साथ विपरीत परिस्थितियां पैदा हो रही, जिससे पानी वाले स्थानो पर भी पानी की अपार समस्याये पैदा हो गई है। इसलिए सिमेंट व कंक्रीट द्वारा बनाए गए सभी बांध, चेकडैम, एनिकट व जलीय बहाव क्षेत्र के अवरोधों को हटाया जाए, जिससे पानी की बढ़ती किल्लत व पानी को लेकर पैदा हो रहें आपसी टकराव से बचा जा सके।

रामभरोस मीना