इंसानी गतिविधियां क्षेत्रीय पर्यावरण में बदलाव के लिए जिम्मेदार

Apr 16, 2021 - 00:55
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इंसानी गतिविधियां क्षेत्रीय पर्यावरण में बदलाव के लिए जिम्मेदार

भारत भौगोलिक व परिस्थितिकी के आधार पर अन्य देशों के मुकाबले यहां की सारी परिस्थितियां विशेष वह अलग पाई जाती हैं, जिन्हें देखते हुए बिगड़ते पारिस्थितिकी तंत्र वह बढ़ते कार्बन उत्सर्जन से यहां मौसम चक्कर बदलने के साथ ही गर्म हवाओं में बढ़ोतरी , शीतकाल में गिरावट, वर्षा चक्कर के बिगड़ने के साथ कृषि फसलों , मानव स्वास्थ्य , प्राकृतिक संपदा,  वन्यजीवों , आर्थिक व सामाजिक सिस्टम पर प्रभाव पड़ने लगा है।
भारत की जलवायु में जो त्वरित बदलाव होने के अनुमान लगाए हैं उससे देश के नेचुरल इकोसिस्टम,  कृषि उपज और प्राकृतिक जल संसाधनों पर दबाव बढ़ता चला जा रहा जिससे  देश जैव विविधता,  भोजन, पानी, ऊर्जा, सुरक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर गंभीर दुष्प्रभाव पड़ने से नकारा नहीं जा सकता। "क्लाइमेट एसेसमेंट रिपोर्ट" के अनुसार जलवायु परिवर्तन देश के हर सेक्टर को नुकसान पहुंचाने जा रहा है।कार्बन उत्सर्जन करने वाले देशों में भारत चीन व अमेरिका के बाद तीसरा सबसे बड़ा देश है, भारत सरकार के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ( मिनिस्ट्री ऑफ अर्थ साइंसेज ) ने " असेसमेंट ऑफ क्लाइमेट चेंज ओवर द इंडियन रीजन " नाम से रिपोर्ट जारी की जिसमें कहा गया कि देश पहले से मौसम की खराब स्थिति का सामना कर रहा है,  दुनिया भर में चल रही इंसानी गतिविधियां क्षेत्रीय पर्यावरण की बदलाव के लिए मुख्यत जिम्मेदार हैं। जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार इंसानी गतिविधियों में प्रमुख हैं,  जीवाश्म ईंधन की खपत और इसमें कोयला सबसे घातक ईंधन। कार्बन डांयक्साइड का उत्सर्जन ये वो ग्रीन हाउस गैस हैं जो वायुमंडल की गर्मी को रोककर ग्लोबल वार्मिंग का कारण बनता है और इन्हीं से जलवायु परिवर्तन को बढ़ावा मिलता है।
पेरिस क्लाइमेट चेंज समझौते के तहत जलवायु परिवर्तन संबंधी मुद्दों पर कानूनी रूप से बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय संधि 2015 संयुक्त राष्ट्र के जलवायु सम्मेलन में बनी, 4 नवंबर 2016 को यह समझौता लागू हो गया, सभी देशों ने विश्व के औसत तापमान में 2 डिग्री की वृद्धि को स्थिर रखने का वादा किया, लेकिन  इसे स्थिर रखने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए गये।कोयले के खदानों से आवश्यकता से अधिक खनन कर उद्योगों के लिए कोयला निकाला जाना, परिवहन के लिए उपयोग किए जा रहे सार्वजनिक, व्यक्तिगत वाहनों द्वारा अनावश्यक परिवहन, ईंट भट्टों  में प्राली का उपयोग, पहाड़ों व वन क्षेत्रों में अनावश्यक खनन, अपशिष्ट, धुल,भूगोल व मौसमी दशाएं प्रदूषण को बढ़ाने का काम कर रही है, नगरों व शहरों के कुल प्रदूषण का 70% प्रदूषण वाहनों से निकले धुंआ से हो रहा है, वायुमंडल में भारी मात्रा में कार्बन एवं राख जमा हो रही है जो ठंड में निचली परत में पहुंचकर सांस व दमा का कारण बन रही है।
वातावरण में फैली गैसों में मुख्यत अम्लीय सूक्ष्म कण, कार्बन मोनोऑक्साइड, बिना जले हाइड्रोकार्बन योगिक, नाइट्रोजन के ऑक्साइड, काज्जल, शीशा एवं एल्डिहाइड आदि वाहनों के आंतरिक दहन क्रिया के फल स्वरुप उत्सर्जित होते हैं, जिनका प्रभाव मानव के साथ जीव जंतु, पेड़ पौधों, भूमि भवन पर पड़ता है, मानव में उत्सर्जित प्रदूषणकारी तत्वों के प्रभाव से खांसी, सिर दर्द, जी मचलाना, घबराहट, आंखों में जलन, दिल व फेफड़ों से संबंधित बीमारी, दमा और रक्त पर प्रभाव पड़ता है।बढ़ते प्रदूषण फेलती अनावश्यक बीमारियों के साथ यदि कार्बन उत्सर्जन की यही स्थिति रही तो इस सदी के आखिर तक देश का औसत तापमान 4 से 5 डिग्री ज्यादा और गर्म हवाओं का जोखिम 4 से 6 गुना बढ़ जाएगा, जिससे जल, जंगल, जमीन, आर्थिक, सामाजिक परिस्थितियां , जीव जंतु व मानव सहित सभी पर दुष्प्रभाव के साथ विनाशकारी स्थिति पैदा होने की संभावनाएं पनप रही है। अतः मानव समाज व सरकार को ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ने से रोकने हेतु ठोस कदम उठाने के साथ प्राकृतिक संपदा ओं के साथ छेड़छाड़ बंद करना बहुत जरूरी है। पर्यावरण संरक्षण को लेकर राजस्थान के अलवर जिले में काम कर रही एलपीएस विकास संस्थान के निदेशक व प्रकृति प्रेमी रामभरोस मीणा ने अपने निजी अनुभवों से यह महसूस किया है, कि मानव को प्रकृति के साथ छेड़छाड़ करने, कार्बनिक व अम्लीय पदार्थों के उत्सर्जन को रोकने में स्वयं व्यक्ति,समाज, सरकार अपने आप की जिम्मेदारी समझते हुए कार्य करना चाहिए , जिससे आगामी ग्लोबल वार्मिंग जैसे  खतरो  से बचने के साथ प्राकृतिक संतुलन को बनाए रखा जा सके।

 

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