सम्पादकीय:- पीने योग्य पानी के प्रबंधन के लिए ठोस कदम उठाना जरूरी

Apr 20, 2021 - 12:38
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सम्पादकीय:- पीने योग्य पानी के प्रबंधन के लिए ठोस कदम उठाना जरूरी

जल या पानी एक  रासायनिक पदार्थ है, जिस के बगैर मानव ही नहीं अपितु संपूर्ण सजीव जगत में कोई नहीं रह सकता, चाहें वह मानव, पशु, जानवर, पक्षी, वनस्पति, स्वपोसी अथवा परपोसी जो भी हो। पीने का पानी शुद्ध मिनरल समुचित उच्च गुणवत्ता वाला पानी होता है, इसके तत्काल या दीर्घगकालिक नुकसान के न्यूनतम खतरे के साथ सेवन या उपयोग किया जाता। पानी का निर्माण "दो हाइड्रोजन व एक ऑक्सीजन परमाणु " से बना,  यह सारे प्राणियों के जीवन का आधार है।जल द्रव ठोस तथा गैसीय अवस्था में पाया जाता है।  
पानी का भारतीय संस्कृति में बहुत बड़ा महत्व है, पीने के पानी की ग्राम स्तर पर प्याऊ, जानवरों के लिए होदिया वह पशु जलनादं तथा जानवरों के लिए परिंदे,जोहडों में पानी डालकर सेवा की जाती रही, रहीम जी ने कहा है की  "रहिमन पानी राखिए , बिन पानी सब सून। पानी गए न ऊबरे, मोती मानस चून।।" अर्थात मानव के पास में चाहे कितनी भी संपदा हो, लेकिन पीने योग्य पानी नहीं है तो सब कुछ व्यर्थ है, इसलिए पानी की व्यवस्था सबसे बड़ी व्यवस्था बताई गई है। पानी की सेवा मानव द्वारा की गई सबसे बड़ी सेवा मानी गई। वैसे पानी के हक, अधिकार  के लिए हमेशा परिवार  , कुटुंब,  कबीले, राज्य,  विदेशों  से आपस में लड़ते आए हैं। पानी चाहे पीने का हो, कृषि क्षेत्र के उपयोग का अथवा औद्योगिक इकाइयों के उपयोग में लेने का,  "पानी पानी ही है", लेकिन पीने का पानी इनमें अपना एक अलग महत्व रखता है।
पृथ्वी की सतह पर जो पानी है उसमें से 97% सागर और महासागर में नमकीना और पीने के काम का नहीं। केवल 3% पानी पीने योग्य, जिसमें से 2.4 प्रतिशत ग्लेशियरों और उत्तरी व दक्षिणी ध्रुव में जमा हुआ है। केवल 0. 6% पानी नदियों, झीलों,  तालाबों में है,  जिसे पीने में इस्तेमाल किया जा सकता है। जल हमारे आहार का एक अनिवार्य पोषक तत्व है, यह हमारी प्यास ही नहीं बुझाता बल्कि शरीर का सबसे बड़ा घटक है, हमारे शरीर के कुल वजन का लगभग 60 से 70 प्रतिशत जल है। भोजन के बिना हम कुछ दिन जीवित रहे सकेंगे,  लेकिन जल के अभाव में अधिक समय जीवित रहना बड़ा कठिन है। क्योंकि यह स्वयं तो पोषक तत्व है ही साथ ही अन्य पोषक तत्वों को शरीर के लिए उपयोगी बनाने में इसकी भूमिका अति महत्वपूर्ण है। "जीवन के लिए जल नितांत आवश्यक है", इसलिए कहा जाता है कि "जल ही जीवन है"। लेकिन दुनिया के ज्यादातर बड़े हिस्सों में पीने योग्य पानी तक लोगों की पहुंच अपर्याप्त हो गई! और वह बीमारी के कारकों, रोगाणुओं या विषैले तत्त्वों  के अस्विकार्य या मिले हुए ठोस पदार्थों से दूषित स्रोतों का इस्तेमाल पीने के पानी में करने लगे हैं। यह पानी पीने योग्य नहीं होता, और पीने या भोजन तैयार करने में इस तरह के पानी का उपयोग बड़े पैमाने पर त्वरित और दीर्घकालिक बीमारियों का कारण बनने के साथ ही यह मौत और विपत्ति का एक प्रमुख कारण है।
बढ़ते जलीय प्रदूषण के कारण नदियों,  झीलों,  तालाबों, पोखरों, झरने के साथ-साथ पातालिय पानी भी प्रदूषित हो गया।  केंद्रीय भूजल बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार भूजल में कार्बोनेट, हाइड्रोकार्बोनेट, कैल्शियम, क्लोरीन, मैग्नीशियम, पोटेशियम आरसेनिक, फास्फेट, नाइट्रेट, थाईमेट, कैल्शियम कार्बोनेट जैसे तत्व पाए गए जो "मीठे जहर" की तरह हैं। जल जनित रोग विश्व के सामने एक चुनौती है, विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनिसेफ का मानना है कि ये सभी बीमारियों के 80% तथा सभी मौतों के एक तिहाई के लिए जिम्मेदार हैं। अकेले भारत में रोज 3000 से अधिक लोग दूषित पानी से होने वाली बीमारियों से मर जाते हैं।दूषित पानी के सेवन से चर्म रोग, पेट रोग, पीलिया, हैजा, दस्त, उल्टियां, टाइफाइड, बुखार हो सकते हैं।
2021 की जनगणना के दौरान भारत पीने के पानी की कमी वाले देशों के समूह में शुमार हो गया। किसी भी देश को पानी की कमी वाला देश तब माना जाता है, जब उसके यहां पानी की उपलब्धता 1700 क्यूबिक मीटर से कम हो, भारत में पानी की उपलब्धता इस सदी के पहले दशक में 15% तक घटकर 1545 क्यूबिक मीटर प्रति व्यक्ति रह गई, जो गर्मीयों में और भी गिरने की संभावना होती है ‌। हमारे द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले पानी की मात्रा प्रकृति द्वारा की जा रही उसकी भरपाई से कई गुना ज्यादा है और यही खतरे की बात है, अगर हमने इस चलन को पलटने के लिए जल्दी ही सुधार के उपाय नहीं किए अथवा पीने के पानी के प्रबंधन पर ध्यान नहीं दिये तो हम अपने आने वाली पीढ़ी के लिए कष्टकारी विरासत छोड़ जाएंगे।
 और इस विनाशकारी स्थिती से बचने , आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित रखने के लिए हमें पानी के पानी के  एक अच्छे शू- प्रबंधन की आवश्यकता के साथ जल संकट किस हद तक देश को प्रभावित कर रहा है, और इससे कैसे निपटा जाना चाहिए, इसके लिए राष्ट्रव्यापी स्तर पर जागरूकता अभियान चलाना आवश्यक है। तभी ही हम इस विनाशकारी विपदाओं से बच और बचा सकते हैं आने वाली पीढ़ीयों को। लेखक के ये अपने निजी विचार है।

 

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