सच्चाई को पहचान कर भ्रमों से मुक्ति पाएं - निरंकारी सतगुरु माता सुदीक्षा

खैरथल (हीरालाल भूरानी ) ‘‘संसार में हम जितनी भी चीजें देखते अथवा अनुभव करते हैं वह सारी परिवर्तनशील हैं। इनमें से किसी भी पदार्थ को शाश्वत सच्चाई नहीं कहा जा सकता। जिस प्रकार दिन ढलता है तब रात होती है और रात के ढलने के उपरान्त फिर से दिन की शुरुवात हो जाती है। ठीक उसी प्रकार किसी भी वस्तु अथवा पदार्थ के अस्तित्व को शाश्वत मान लेना हमारा भ्रम है क्योंकि वास्तविक सत्यता तो केवल इस निराकार परमात्मा में है जिसे विभिन्न नामों से पुकारा जाता है। इस निरंतर एकरस रहने वाली सच्चाई को अपनाने से निसंदेह हम सभी प्रकार के भ्रमों से मुक्ति पा सकते हैं।’’ समालखा में आयोजित तीन दिवसीय संत समागम के पावन अवसर पर रविवार रात्रि को सतगुरु माता जी ने लाखों की संख्या में सम्मिलित हुए श्रद्धालुओं को इन अमृतमयी प्रवचनों से अनुगृहीत किया।
संत निरंकारी मंडल के प्रेस एवं पब्लिसिटी प्रभारी अमृत खत्री ने बताया कि सतगुरु माता जी ने आगे कहा कि हम अक्सर अपने विचारों और आदतों में सीमित रहते हैं। इसे उदाहरण द्वारा समझाया गया, जैसे पानी के स्रोतों को देखकर किसी का दृष्टिकोण ग्लास, बाल्टी, तालाब, या समुद्र तक सीमित हो सकता है। इसी तरह, हमें अपने जीवन में सोच और समझ का विस्तार करना है। कुएं के मेंढक की भांति अपनी सीमित सोच को सच्चाई मान लेने से जीवन का वास्तविक और विशाल स्वरूप छूट सकता है।
इसके पूर्व निरंकारी राजपिता रमित जी ने अपने विचारों में कहा कि 77वें समागम में भाग लेना संतों और श्रद्धालुओं के लिए अनोखा अवसर है। यह समागम जीवन को गहराई और विस्तार प्रदान करता है। सद्गुरु की कृपा और शिक्षाओं ने मानव अस्तित्व को असीम और गौरवशाली बना दिया है। सच्चा स्वार्थ अपने अस्तित्व को पहचानने में है। सतगुरु सिखाते हैं कि जीवन का अर्थ समझने के लिए हमें अपने स्वार्थ से परे जाकर मानवता की सेवा करनी है।
सतगुरु समझाते हैं कि भक्ति केवल साधन नहीं, बल्कि साध्य है। जब भक्ति जीवन का केंद्र बन जाती है, तो सांसारिक सुख गौण हो जाते हैं। सतगुरु द्वारा प्रदत्त आध्यात्मिकता हमारी सोच, हमारी दृष्टि, हमारे प्रेम, सेवा, समर्पण, करूणा व अन्य दिव्य गुणों का विस्तार करती है। संगत में आकर ब्रह्मज्ञान प्राप्त करना और संतों के वचनों को सुनना, हमारी सोच को व्यापक बनाता है। जब हम इस निराकार से जुड़ते हैं, तो जीवन के हर रंग को अपनाते हुए उससे पृथक भी रहना सीखते हैं। यह निराकार हर समय, हर स्थिति में मौजूद है। इसे पहचानकर, हर व्यक्ति अपने जीवन को सही दिशा में विस्तार कर सकता है। वसुधैव कुटुंबकम् का लघु रूप - निरंकारी संत समागम निरंतर दूसरे दिन भी सकारात्मक तरंगे बिखेरता रहा।






