श्री कृष्ण को पालकी में बिठा, पवित्र जल स्रोत पर कराया स्नान
लक्ष्मणगढ़ (अलवर/कमलेश जैन) हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार, भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को जलझूलनी एकादशी कहते हैं। आज 3 सितंबर ग्यारस को परिवर्तिनी एकादशी, पदमा एकादशी, वामन एकादशी एवं डोल ग्यारस आदि नामों से भी जाना जाता है। कुछ स्थानों पर भगवान श्रीकृष्ण की सूरज पूजा (जन्म के बाद होने वाला मांगिलक कार्यक्रम) के रूप में क्षेत्र में मनाया गया।
शिशु के जन्म के बाद जलवा पूजन, सूरज पूजन या कुआं पूजन का विधान है। उसी के बाद अन्य संस्कारों की शुरूआत होती है। यह पर्व उसी का एक रूप माना जाता है।
कस्बे में भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा को झांकी के रूप में मन्दिर से पालकी में पवित्र जलस्रोत रोणीजा रोड स्थित बाध पर लाया गया। और वहां उन्हें स्नान कराया गया । एवं वस्त्रो की धुलाई की गई। फिर वापस आकर उनकी पूजा की गई। अनुयायियों द्वारा व्रत उपवास किया गया। महिलाओं ने पालकी में भगवान के दर्शन कर व्रत को खोला ।भगवान की इस झांकी को देखने के बाद व्रत खोलने की परम्परा है। झांकी में भगवान को पालकी यानि डोली में स्नान के लिए ले जाया जाता है, इसलिए इसे डोल एकादशी भी कहते है। मान्यता यह भी है कि भगवान विष्णु आज के दिन करवट बदलते है। इस बदलाव के कारण इसे परिवर्तिनी एकादशी कहते है। यह मौसम में बदलाव का भी सूचक है।
योग शिक्षक पंडित लोकेश कुमार केअनुसार मनुष्य यत्न के साथ विधिपूर्वक इस व्रत को करते हुए रात्रि जागरण करते हैं, उनके समस्त पाप नष्ट होकर अंत में वे स्वर्गलोक को प्राप्त होते हैं। इस एकादशी की कथा के श्रवणमात्र से वाजपेयी यज्ञ का फल प्राप्त होता है।