बकाया थी फीस, वकीलों ने कोर्ट से की फैसला रोकने की मांग; जज ने ठोक दिया 50 हजार जुर्माना
कोच्चि (केरल/कमलेश जैन) हाल ही में दो वकीलों पर 50 हजार रुपए का जुर्माना लगाने का आदेश केरल हाई कोर्ट ने दिया है। इन वकीलों ने अपने पूर्व क्लाइंट्स से बकाया फीस वसूलने के लिए भूमि अधिग्रहण केस में फैसला रोकने की मांग उठाई थी। इसके लिए दोनों वकीलों ने हाई कोर्ट में रिट पेटिशन डाली थी। जस्टिस बेकू कुरियन थॉमस ने वकीलों के इस आचरण की कड़ी निंदा की। साथ ही उन्होंने यह भी कहाकि कोई भी वकील कानूनी कार्यवाही को रोककर क्लाइंट पर शुल्क भुगतान करने के लिए दबाव नहीं डाल सकता।
कानूनी गरिमा को नुकसान पहुंचाने वाले अदालत ने इस मामले में कहाकि इस तरह के कृत्य कानूनी गरिमा को नुकसान पहुंचाने वाले हैं। इसकी इजाजत नहीं दी जा सकती। जस्टिस थॉमस ने कहाकि चाहे हालात कछ भी हों, क्लाइंट पर दबाव नहीं बनाया जा सकता। वकील द्वारा फीस चुकाने के लिए क्लाइंट को ब्लैकमेल करना ठीक नहीं है। उन्होंने आगे कहाकि इससे भी खराब स्थिति तब होती है जब वकील, अपनी नियुक्ति समाप्त होने के बाद, उसी कार्यवाही को रोकने का प्रयास करता है। जिसमें वह मुकदमेबाज की ओर से उपस्थित था। अदालत ने यह फैसला आठ अप्रैल को सुनाया।
कोर्ट ने फैसले में क्या कहा केरल हाई कोर्ट के फैसले में आगे कहा गया है कि कानूनी पेशे से जुड़ी प्रतिष्ठा इसके सदस्यों के आचरण पर निर्भर करती है। अदालत ने वकीलों को चेतावनी दी कि अगर उनके काम से उनके अपने मुवक्किलों को नुकसान पहुंचे या न्याय में देरी हो, तो यह सीधे पेशे की गरिमा के लिए ठीक नहीं है।
अदालत ने यह भी कहाकि अगर यह मान भी लिया जाए कि याचिकाकर्ता बकाया शुल्क के बारे में सही हैं, तब भी एक वकील को कोई अधिकार नहीं कि वह अपनी फीस मिलने तक कानूनी कार्यवाही को रोक सके। कोर्ट ने आगे कहाकि वकीलों को बकाया फीस का मामला सुलझाने के लिए सिविल कोर्ट का रुख करना चाहिए। उन्होंने कहाकि हाई कोर्ट के सामने रिट पेटिशन दायर करना, इस तरह के मामलों में कोई उपाय नहीं है।
क्या है मामला यह मामला दो वकीलों और उनके पूर्व क्लाइंट्स से संबंधित है। वकीलों (याचिकाकर्ता) ने, रिट के जरिए हाईकोर्ट का रुख किया। उन्होंने दावा किया उन्होंने कई साल तक अपने क्लाइंट्स की तरफ से मामले की पैरवी की है। लेकिन इसके बावजूद उन्हें इसकी उचित फीस नहीं दी गई। वकीलों ने यह भी आरोप लगाया कि नए वकील ने बिना उनकी एनओसी के ही केस ले लिया। इसलिए, वकीलों ने अपनी फीस विवाद के निपटारे तक भूमि अधिग्रहण से संबंधित फैसला रोके जाने का अनुरोध किया। हाई के समक्ष दायर रिट के चलते इस मामले में कार्रवाई कई महीनों तक रुकी रही।
क्लाइंट ने क्या कहा वहीं, इस मामले में क्लाइंट्स का कहना है कि वकीलों को उचित ठीक-ठाक रकम दी गई थी। इसके बावजूद, वह लोग गलत और गैरवाजिब मांग करते रहे। क्लाइंट्स ने यह भी तर्क दिया कि हालत यह हो गई थी कि उनका इन वकीलों से भरोसा उठ गया था। ऐसे में मजबूर होकर उसे नया वकील करना पड़ा। हाई कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई से इनकार करते हुए कहाकि इस तरह के केसेज पहले सिविल कोर्ट में जाने चाहिए।

