आस्था के साथ मनाया गया श्री रावल मल्लीनाथ जी का 708वां जन्मोत्सव, अष्ट प्रकृति महायज्ञ में दी आहुतियां
बालोतरा / राजस्थान
बालोतरा के तिलवाड़ा स्थित श्री रावल मल्लीनाथ जी मंदिर में उनके 708वें जन्मोत्सव पर धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। पूरे दिन मंदिर परिसर में भक्तिमय वातावरण और उत्सव का माहौल रहा। कार्यक्रम की शुरुआत सुबह मंगला आरती से हुई। मंदिर में अष्ट प्रकृति महायज्ञ किया गया। महायज्ञ की पूर्णाहुति के बाद परंपरा के अनुसार हरिश्चंद्र सिंह जसोल ने ध्वजारोहण किया। इस अवसर पर श्री रावल मल्लीनाथ जी मंदिर थान मल्लीनाथ (तिलवाड़ा), श्री रावल मल्लीनाथ जी मंदिर मालाजाल (तिलवाड़ा), श्री राणी रूपादे जी मंदिर पालिया (तिलवाड़ा) में विशेष भोग अर्पित किया गया। कन्याओं का पूजन किया कार्यक्रम में तिलवाड़ा, बोरावास और थान मल्लीनाथ ग्राम पंचायत की कन्याओं का पूजन किया गया। कन्याओं को प्रसाद और दक्षिणा भेंट कर आशीर्वाद प्राप्त किया। साथ ही श्रद्धालुओं में महाप्रसादी का वितरण किया गया। इस अवसर पर श्री रावल मल्लीनाथ श्री राणी रूपादे संस्थान (तिलवाड़ा) के प्रबंध उपाध्यक्ष हरिश्चंद्र सिंह जसोल ने महायज्ञ में बैठकर भक्तों के जीवन में सुख, शांति एवं समृद्धि की कामना के साथ विशेष आहुतियां दी।आचार्य अभिषेक जोशी सहित अन्य आचार्यों और पंडितों ने यज्ञ करवाया। कार्यक्रम के दौरान पुष्कर से आए नगारची कलाकारों, घुड़ नृत्य कलाकारों, गैर नृत्य और स्थानीय दमामी कलाकारों ने आकर्षक प्रस्तुतियां दीं। आने वाले वर्षों में और भव्य आयोजन होगा-हरिश्चंद्र सिंह जसोल हरिश्चंद्र सिंह जसोल ने बताया कि श्री रावल मल्लीनाथ जी के जन्मोत्सव को मंदिर परिसर में मनाने की औपचारिक शुरुआत इस वर्ष पहली बार की गई है। आने वाले वर्षों में इसे और अधिक भव्य और दिव्य स्वरूप में आयोजित करने का प्रयास किया जाएगा। उन्होंने मालाणी क्षेत्र सहित श्रद्धालुओं से अपने-अपने घरों एवं क्षेत्रों में भी इस पावन तिथि को श्रद्धा एवं भक्ति के साथ मनाने का आग्रह किया। उन्होंने बताया कि श्री रावल मल्लीनाथ जी मालाणी क्षेत्र के संस्थापक और सामाजिक समरसता के महान प्रतीक रहे हैं। उनके और श्री राणी रूपादे जी के भजनों में लगभग सात सौ वर्ष पूर्व समाज को सत्य, धर्म, सेवा और एकता के मार्ग पर चलने का संदेश दिया गया है। श्री रावल मल्लीनाथ जी एवं श्री राणी रूपादे जी निजिया पंथ से जुड़े हुए थे। उनके गुरु उगमसी भाटी थे और उनके गुरु भाई मेघधारू जी थे। तिलवाड़ा का ऐतिहासिक मेला भी संत परंपरा से जुड़ा हुआ है, जिसका आयोजन सैकड़ों वर्ष पूर्व गुरु उगमसी भाटी के सानिध्य में संत समागम से हुआ था। उस समय मेवाड़ से महाराणा कुम्भा और उनकी राणी, गुजरात से जैसल-तोरल, बाबा रामदेवजी सहित उनके समय के अनेक समकालीन संत-महात्मा संत समागम में आए थे। इस पंथ की विशेषता निराकार उपासना की रही है। 25वें गादीपति ने शुरू किया था अष्ट प्रकृति महायज्ञ हरिश्चंद्र सिंह जसोल ने बताया- श्री रावल मल्लीनाथ जी के 25वें गादीपति रावल किशन सिंह जसोल के मार्गदर्शन में पिछले वर्षों से तिलवाड़ा मेले के ध्वजारोहण के दिन मंदिर परिसर में अष्ट प्रकृति महायज्ञ का आयोजन निरंतर किया जाता रहा है। वर्ष 2011 में सेवानिवृत्ति के बाद रावल किशन सिंह जसोल ने सत्य, धर्म और सेवा के मार्ग पर चलकर समाज के सामने प्रेरणादायक उदाहरण पेश किया है उनके मार्गदर्शन में इस क्षेत्र में धर्म की ध्वजा की वापस स्थापना हुई है। हरिश्चंद्र सिंह जसोल ने कहा-सक्षम संस्थान, जिसने पिछले वर्ष रामदेवरा में नेत्र कुंभ का सफल आयोजन किया था, उनके द्वारा आगामी वर्ष श्री रावल मल्लीनाथ जी के 709वें जन्मोत्सव के अवसर पर श्री मल्लीनाथ पशु मेला, तिलवाड़ा में भी नेत्र कुंभ के आयोजन हो, ऐसी आशा व्यक्त करता हूं। इससे क्षेत्र के लोगों को लाभ मिल सकेगा। यज्ञ का उद्देश्य मानव और प्रकृति के बीच संतुलन करना आचार्य अभिषेक जोशी ने कहा- अष्ट प्रकृति महायज्ञ का मूल उद्देश्य मानव और प्रकृति के बीच संतुलन स्थापित करना है। वेदों में प्रकृति, वृक्षों और पशुओं के संरक्षण का स्पष्ट संदेश दिया गया है। श्री रावल मल्लीनाथ जी ने भी अपने जीवन के माध्यम से वृक्ष संरक्षण, पशु संरक्षण और प्रकृति के सम्मान का संदेश दिया है। यदि मानव प्रकृति का अंधाधुंध दोहन करेगा तो प्रकृति भी विनाश का कारण बन सकती है। इसलिए मानव, प्रकृति, जल, वृक्षों, पशु-पक्षियों और समस्त जीवों के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। ऐसे धार्मिक आयोजन समाज को धर्म, संस्कृति और प्रकृति संरक्षण के प्रति जागरूक करने का माध्यम बनते हैं।