गोविंदगढ़ में संत रविदास-सुंदरदास जयंती मनाई गई: कस्बे में निकाली शोभायात्रा, झांकियां सजाई

Feb 1, 2026 - 12:46
Feb 1, 2026 - 13:13
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गोविंदगढ़ में संत रविदास-सुंदरदास जयंती मनाई गई: कस्बे में निकाली शोभायात्रा, झांकियां सजाई

गोविंदगढ़ में रविवार को संत शिरोमणि रविदास और संत सुंदरदास की जयंती मनाई गई। इस अवसर पर रामगढ़ विधायक सुखवन्त सिंह मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। उन्होंने उपस्थित लोगों के साथ संतों के चरणों में नमन कर विश्व शांति की कामना की।

संत रविदास मंदिर पर जयंती समारोह के तहत शनिवार रात को सत्संग का आयोजन किया गया। रविवार सुबह पूजा के बाद कस्बे में शोभायात्रा निकाली गई, जिसमें भगवान के प्रतिरूप की झांकी शामिल थी। इससे पूर्व, समाज के लोगों और बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने संत रविदास की प्रतिमा पर पुष्प अर्पित कर उन्हें नमन किया। दोपहर 3 बजे से लंगर प्रसादी का वितरण शुरू किया गया।

विधायक सुखवन्त सिंह ने संत रविदास के प्रवचनों का उल्लेख करते हुए उनके अहम संदेश "मन चंगा तो कठौती में गंगा" पर प्रकाश डाला। उन्होंने समझाया कि यदि मनुष्य का मन शुद्ध और पवित्र है, तो ईश्वर हृदय में ही निवास करते हैं।

राधेश्याम जाटव ने भारत भूमि की पवित्रता पर भी बात की, जहां अनेक सूफी संतों ने जन्म लिया है। उन्होंने कहा कि हमें अपनी भारत भूमि पर गर्व है, जहां हमें ज्ञानी संतों का अमूल्य ज्ञान प्राप्त होता है। इस 649वीं जयंती के अवसर पर, कार्यक्रम में संत गुरु रविदास के विचारों जैसे समता, समानता, सामाजिक न्याय और मानवता को जन-जन तक पहुंचाने का संदेश दिया गया।

इसी क्रम में, खंडेलवाल वैश्य समाज की ओर से संत सुंदरदास की जयंती भी मनाई गई। खंडेलवाल महिला मंडल की महिलाओं ने इस अवसर पर "मेरे सतगुरु तेरी नौकरी", "सुंदर धीरज धारी तू", "सहजी रहेगी आई", "सुंदर देह मलिन अती" और "सूरी वस्तु को भोग" जैसे भजन प्रस्तुत किए। इसके बाद, सभी समाज बंधुओं द्वारा महाआरती की गई और प्रसाद वितरण किया गया।

कस्बे में एक शोभायात्रा भी निकाली गई। इस दौरान, समाज के अध्यक्ष कैलाशचंद गुप्ता ने संत सुंदरदास की जीवन शैली पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि संत सुंदरदास ने 42 रचनाएं लिखीं, जो आज भी हिंदी साहित्य में प्रासंगिक हैं।

उनकी प्रमुख रचनाओं में ज्ञान समुद्र, सुंदर विलास, सर्वांग योग प्रदीपिका, पंचेंद्रीय चरित्र, सुख समाधि, अद्भुत उपदेश और स्वप्न प्रबोध शामिल हैं। संत सुंदरदास का जीवन प्रेरणास्पद था और वे विद्वान संतों में प्रमुख थे।

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