ज्ञान भारतम् मिशन: भरतपुर में होगा ऐतिहासिक व सांस्कृतिक पाण्डुलिपियों का व्यापक सर्वेक्षण; जिला प्रशासन ने कसी कमर
भरतपुर,(कौशलेन्द्र दत्तात्रेय) भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा देश की समृद्ध सांस्कृतिक एवं बौद्धिक विरासत के संरक्षण और दस्तावेजीकरण के उद्देश्य से देशव्यापी पाण्डुलिपि परियोजना ज्ञान भारतम् मिशन प्रारम्भ किया गया है। इस महत्वाकांक्षी मिशन के अंतर्गत जिले में उपलब्ध ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एवं ज्ञानपरक पाण्डुलिपियों का डिजिटल एवं भौतिक सर्वेक्षण निर्धारित समय-सीमा में सम्पन्न कराया जाएगा।
अतिरिक्त कलक्टर शहर राहुल सैनी ने बताया कि मिशन के प्रभावी क्रियान्वयन हेतु जिला स्तर पर नियुक्त सर्वेयर्स के साथ समन्वय स्थापित कर विस्तृत सर्वेक्षण प्रतिवेदन तैयार किया जाएगा। साथ ही स्थानीय विषय विशेषज्ञों, शैक्षणिक संस्थानों, पुस्तकालयों, मंदिरों, मठों, संग्रहालयों तथा अन्य संबंधित हितधारकों के सहयोग से सर्वेक्षण कार्य को व्यापक एवं व्यवस्थित रूप से संचालित किया जाएगा। उन्होंने बताया कि सर्वेक्षण कार्य की नियमित समीक्षा कर साप्ताहिक प्रगति प्रतिवेदन विभाग को प्रेषित किया जाएगा। इसके अतिरिक्त जन-जागरूकता अभियानों, प्रदर्शनियों तथा छात्र स्वयंसेवकों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की जाएगी, जिससे जिले में उपलब्ध अमूल्य पाण्डुलिपियों की पहचान एवं संरक्षण का कार्य अधिक प्रभावी ढंग से हो सके। उन्होंने निर्देश दिए हैं कि जिले के सभी संबंधित विभाग, शैक्षणिक संस्थान, पुस्तकालय, मंदिर, मठ, संग्रहालय एवं निजी संग्रहकर्ता इस अभियान में सक्रिय सहयोग प्रदान करें। साथ ही विभागीय सोशल मीडिया हैंडल्स एवं वेबसाइटों के माध्यम से ज्ञान भारतम् मिशन का व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाए, ताकि अधिक से अधिक लोग इस राष्ट्रीय महत्व की पहल से जुड़ सकें।
उन्होंने कहा कि जिले में स्थित विश्वविद्यालयों, पुस्तकालयों, मंदिरों, मठों एवं निजी संग्रहकर्ताओं के साथ आवश्यक समन्वय स्थापित कर निर्धारित समय-सीमा में सर्वेक्षण कार्य पूर्ण कराया जाएगा। सर्वेक्षण की अनुपालना रिपोर्ट कला, साहित्य, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग, राजस्थान सरकार को प्रेषित की जाएगी तथा उसकी प्रति जिला प्रशासन को भी उपलब्ध कराई जाएगी। उन्होंने बताया कि ज्ञान भारतम् मिशन देश की प्राचीन ज्ञान परंपरा, सांस्कृतिक धरोहर और ऐतिहासिक दस्तावेजों के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है, जिसके माध्यम से आने वाली पीढ़ियों के लिए अमूल्य पाण्डुलिपियों को सुरक्षित एवं संरक्षित किया जा सकेगा।


