परंपरा व रीति रिवाजानुसार 9 व शास्त्रोक्त 11 मार्च को मनाया जाएगा बास्योड़ा

Mar 5, 2026 - 18:13
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परंपरा व रीति रिवाजानुसार 9 व शास्त्रोक्त 11 मार्च को मनाया जाएगा बास्योड़ा

खैरथल (हीरालाल भूरानी) रंगों के उत्सव होली के समापन के साथ ही अब लोक आस्था के पर्व 'बास्योड़ा' (शीतला अष्टमी) की तैयारियां शुरू हो गई हैं। हालांकि, इस वर्ष बास्योड़ा पूजन की सटीक तिथि को लेकर महिलाओं और श्रद्धालु परिवारों के बीच असमंजस की स्थिति बनी हुई है। जहां ज्योतिषाचार्यों और पंचांगों के अनुसार शास्त्रोक्त शीतला अष्टमी 11 मार्च को है, वहीं अलवर सहित आसपास के क्षेत्रों में कुल परंपरा और प्राचीन रीति-रिवाजों के अनुसार यह पर्व 11 मार्च को मनाया जाएगा। पंडित यज्ञदत्त शर्मा के अनुसार, पंचांग गणना के आधार पर चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि यानी शीतला अष्टमी बुधवार, 11 मार्च को पड़ रही है। शास्त्र सम्मत पूजन इसी दिन श्रेष्ठ माना गया है। पर लोक परंपराओं की मान्यता कुछ अलग है। ग्रामीण व शहरी अंचलों में यह परंपरा चली आ रही है कि होली दहन के बाद शीतला माता के पूजन के लिए गुरुवार और सोमवार के वार को लांघा (छोड़ा) नहीं जाता है। इस बार 5 मार्च को पड़ने वाले गुरुवार को बास्योड़ा मनाना कच्चा माना जा रहा है क्योंकि उस दिन भाई दूज का पर्व भी है। ऐसे में महिलाओं और समाज के प्रबुद्धजनों ने निर्णय लिया है कि कुल परंपरा का निर्वहन करते हुए 9 मार्च, सोमवार को ही बास्योड़ा मनाया जाना तर्कसंगत है।

 8 मार्च को रांधा पुआ, 9 को ठंडे पकवानों से पूजन परंपरा के अनुसार, पूजन से एक दिन पूर्व भोजन तैयार किया जाता है। क्षेत्रीय मान्यताओं में लोक हमेशा शास्त्र पर भारी पड़ता रहा है। अलवर जिले के अधिकांश परिवारों में पूर्वजों के समय से चली आ रही परंपराओं को ही प्राथमिकता दी जाती है। भाषा में रांधा पुआ कहा जाता है। 8 मार्च रविवार के दिन घरों में विशेष पकवान जैसे राबड़ी, पूए, पकौड़ी, दही बड़े और मीठे चावल तैयार किए जाएंगे। नौ मार्च सोमवार को अलसुबह महिलाएं शीतला माता के मंदिर जाकर ठंडे पकवानों का भोग लगाएंगी और बासी भोजन(बास्योड़ा) ग्रहण किया जाएगा।
मान्यता है कि इस दिन के बाद से घरों में ताजा और गर्म भोजन की जगह ठंडी तासीर वाले खाद्य पदार्थों का महत्व बढ़ जाता है। पंडितों का कहना है कि जो परिवार पंचांग को मानते हैं, वे 11 मार्च को पूजन करेंगे, लेकिन जो कुल परंपरा और वार (सोमवार) को प्रधानता देते हैं, वे 9 मार्च को ही माता का द्वारे पूजेंगे। आरोग्य और सुख-समृद्धि का पर्व बास्योड़ा का पर्व केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि आयुर्वेद और स्वास्थ्य से भी गहरा संबंध रखता है। पंडितों के अनुसार, शीतला माता की पूजा अर्चना करने से परिवार में चेचक (माता), खसरा, फोड़े-फुंसी, बुखार और त्वचा से संबंधित बीमारियों का प्रकोप नहीं होता है। शीतला माता को शीतलता की देवी माना गया है, जो ग्रीष्म ऋतु के आगमन पर आरोग्य और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करती हैं।

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