जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ का जन्म और तपकल्याणक 12 मार्च को
लक्ष्मणगढ़ (अलवर/कमलेश जैन) जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ (ऋषभदेव) का जन्म और तप कल्याणक 12 मार्च को कस्बे के आदिनाथ दिगंबर जैन मंदिर में बड़ी धूमधाम से मनाया जाएगा । जैन मान्यताओं के अनुसार, भगवान आदिनाथ ने ही इस युग में सभ्यता की नींव रखी और मानव जाति को जीवन जीने की कला सिखाई। उन्हें ऋषभदेव, ऋषभनाथ, पुरूदेव और आदिब्रह्मा जैसे नामों से भी जाना जाता है।
उनका जन्म उत्तर प्रदेश के अयोध्या नगर में हुआ था। उनके पिता राजा नाभि राय और माता रानी मरुदेवी थीं। उनका प्रतीक चिन्ह 'वृषभ' (बैल) है, जो कृषि, शाकाहार और अहिंसा का प्रतीक माना जाता है। उन्होंने ही समाज को असि (रक्षा), मसि (लेखन) और कृषि का ज्ञान प्रदान किया था।
12 मार्च के कार्यक्रम और आयोजन
12 मार्च को जैन मंदिरों में विशेष धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं। मंदिरों में भगवान के जन्म और तप कल्याणक की विशेष पूजा और विधान किए जाएंगे। सुबह के समय भगवान का दुग्धाभिषेक और विश्व शांति की कामना के लिए शांतिधारा की जाएगी।
भजन संध्या और दीपार्चना: कस्बे में शाम को संगीतमय आरती,और भजनों का आयोजन किया जाएगा।
भगवान आदिनाथ के प्रथम पुत्र भरत चक्रवर्ती के नाम पर ही इस देश का नाम 'भारत' पड़ा। उनकी दो पुत्रियाँ थीं— ब्राह्मी और सुंदरी, जिन्हें उन्होंने लिपि और अंक विद्या का ज्ञान दिया था।