25 जुलाई से शुरू होगा चतुर्मास, आत्मशुद्धि और साधना में लीन होंगे श्रद्धालु; चार महीने तक मांगलिक कार्यों पर रहेगा विराम

Jul 18, 2026 - 18:30
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25 जुलाई से शुरू होगा चतुर्मास, आत्मशुद्धि और साधना में लीन होंगे श्रद्धालु; चार महीने तक मांगलिक कार्यों पर रहेगा विराम

लक्ष्मणगढ़ (अलवर/कमलेश जैन)। हिंदू धर्म में विशेष आध्यात्मिक महत्व रखने वाला पवित्र 'चतुर्मास' इस वर्ष 25 जुलाई से प्रारंभ होने जा रहा है। आगामी चार महीनों तक चलने वाली यह अवधि पूरी तरह से भगवान विष्णु की आराधना, व्रत, तपस्या और आत्मशुद्धि के लिए समर्पित रहेगी। चतुर्मास की शुरुआत के साथ ही सभी प्रकार के मांगलिक कार्यों पर विराम लग जाएगा।

स्थानीय ज्योतिषाचार्य पंडित लोकेश कुमार ने बताया कि हिंदू पंचांग के अनुसार, आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी यानी देवशयनी एकादशी से चतुर्मास का प्रारंभ माना जाता है, जो इस वर्ष 25 जुलाई 2026 को मनाई जाएगी। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन सृष्टि के पालनहार भगवान विष्णु क्षीर सागर में योग निद्रा में चले जाते हैं। इसके बाद वे कार्तिक मास की देवउठनी एकादशी के दिन जागेंगे, जिसके बाद ही पुनः शुभ व मांगलिक कार्य शुरू हो सकेंगे। इस चार महीने की अवधि में सावन, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक मास आएंगे।

  • सात्विक जीवन और त्याग का है विशेष महत्व

पंडित लोकेश कुमार के अनुसार, चतुर्मास के दौरान सात्विक जीवन शैली अपनाने और भक्ति मार्ग पर चलने का विशेष फल मिलता है। इस दौरान श्रद्धालु अपनी इच्छाओं और आदतों पर नियंत्रण रखने के लिए भोजन में दूध, दही, तेल, नमक या मीठे जैसी प्रिय वस्तुओं का त्याग करते हैं। धार्मिक दृष्टि से इस समय विष्णु सहस्रनाम, गीता का पाठ, सुबह जल्दी उठकर पूजा-पाठ और जरूरतमंदों को दान करना अत्यंत कल्याणकारी माना गया है।

  • इन कार्यों पर रहेगी मनाही

चतुर्मास की अवधि में संयम और अनुशासन का पालन करना अनिवार्य माना गया है। इस दौरान विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन जैसे बड़े मांगलिक कार्य पूर्णतः वर्जित रहेंगे। इसके साथ ही तामसिक भोजन, मांसाहार, क्रोध, झूठ और नकारात्मक विचारों से दूरी बनाने की परंपरा है।

  • समाप्ति पर होगा उद्यापन

चार महीने के इस कड़े नियम और त्याग के बाद देवउठनी एकादशी पर इसका विधि-विधान से उद्यापन किया जाता है। उद्यापन के दौरान भगवान विष्णु व माता लक्ष्मी की विशेष पूजा-अर्चना कर, ब्राह्मणों व जरूरतमंदों को भोजन कराया जाता है और दान-पुण्य के बाद ही त्यागी गई वस्तुओं को पुनः ग्रहण किया जाता है। कुल मिलाकर, चतुर्मास का यह समय मानव जीवन में सुख, शांति और सकारात्मकता का संचार करने वाला एक स्वर्णिम अवसर है।

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