संत शिरोमणि स्वामी टेऊँराम जी की जयंती पर विशेष आलेख: मानवता, प्रेम और समरसता के अमर संदेशवाहक

Jul 18, 2026 - 17:51
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संत शिरोमणि स्वामी टेऊँराम जी की जयंती पर विशेष आलेख: मानवता, प्रेम और समरसता के अमर संदेशवाहक

खैरथल हीरालाल भूरानी भारत की सनातन संत परंपरा हमेशा से ही वैश्विक कल्याण, आध्यात्मिक चेतना और सामाजिक उत्थान का मार्ग प्रशस्त करती आई है। इसी दिव्य परंपरा में 'प्रेम प्रकाश पंथ' के संस्थापक, आचार्य श्री 1008 सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज एक ऐसे युगद्रष्टा संत थे, जिनका संपूर्ण जीवन समाज सुधार, अध्यात्म, दर्शन और मानव सेवा को समर्पित रहा। आगामी 19 जुलाई (रविवार) को उनकी पावन जयंती के अवसर पर देश-विदेश में विभिन्न आध्यात्मिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है।

  • सिंध प्रांत में हुआ था प्राकट्य, अल्पायु में ही लिया संन्यास

जयपुर स्थित श्री अमरापुर स्थान के संत मोनू राम के अनुसार, स्वामी टेऊँराम जी का जन्म विक्रम संवत 1944 (6 जुलाई 1887) में आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को सिंध प्रांत के खंडू ग्राम में हुआ था। उनके पिता श्री चेलाराम एवं माता श्रीमती कृष्ण देवी के धार्मिक संस्कारों का प्रभाव स्वामी जी पर बचपन से ही दिखाई देने लगा।

मात्र 14 वर्ष की किशोरावस्था में उन्होंने गुरु श्री आसुराम जी से मंत्र दीक्षा ली और कठिन योग-साधना में लीन हो गए। लगभग 30 वर्ष की आयु में उन्होंने पूर्ण संन्यास धारण कर लोक कल्याण को अपना परम ध्येय बना लिया। संवत 1999 (पुरुषोत्तम जेठ मास) में 55 वर्ष की अल्पायु में हैदराबाद के अमरापुर दरबार में उनका महानिर्वाण हुआ।

  • "सतनाम साक्षी" का महामंत्र और कुरीतियों पर प्रहार

स्वामी जी का दृढ़ विश्वास था कि परमात्मा की प्राप्ति किसी बाहरी आडंबर या कर्मकांड से नहीं, बल्कि निर्मल हृदय और निष्काम मानव सेवा से संभव है। उन्होंने समाज को "मानव सेवा ही ईश्वर सेवा है" का अमर संदेश दिया। उन्होंने गुरु महिमा को सर्वोपरि बताते हुए जन-जन तक "सतनाम साक्षी" का महामंत्र पहुँचाया। इसके साथ ही उन्होंने समाज में व्याप्त जाति-पाति, छुआछूत, ऊँच-नीच और सांप्रदायिकता जैसी कुरीतियों का मुखर विरोध कर सामाजिक समरसता की नींव मजबूत की।

  • साहित्य साधना और कालजयी रचनाएँ

सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज एक उच्च कोटि के साहित्यकार और कवि भी थे। उन्होंने आम जनता की सरल लोकभाषा में कई कालजयी आध्यात्मिक ग्रंथों की रचना की। उनके प्रमुख ग्रंथों में श्री प्रेम प्रकाश ग्रंथ (जिसमें दोहावली, कवितावली और छंद्दावली संकलित हैं), यमराज नचिकेता कथा, वामन बली कथा, श्रुति संवाद अमर कथा, उलटबासी भजनमाला, अमरपुर वाणी, श्लोकमाला और साक्षी दर्शन आदि विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

  • वैश्विक स्तर पर जारी है सेवा की दिव्य परंपरा

 स्वामी जी द्वारा स्थापित 'प्रेम प्रकाश पंथ' आज भी उनके दिखाए मार्ग पर चलते हुए संसार भर में प्रेम, सेवा और शिक्षा का उजियारा फैला रहा है। श्री अमरापुर स्थान के माध्यम से आज भी देश-विदेश में सत्संग, भजन, बाल संस्कार शिविर और जनहित के निःशुल्क सेवा कार्य निरंतर संचालित किए जा रहे हैं, जो उनकी अमर आध्यात्मिक विरासत को जीवंत बनाए हुए हैं।

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