योजनाएं फेल: पेट की आग में स्वाहा हो रहा मासूमों का बचपन, नशे की गिरफ्त में बाल श्रमिक
लक्ष्मणगढ़ (अलवर/कमलेश जैन) उपखंड क्षेत्र सहित कस्बे में गरीब परिवारों के बच्चे कचरे में काम करने को मजबूर हैं। सरकार बाल श्रम और शिक्षा के लिए योजनाएं चला रही है, लेकिन बच्चों की संख्या कम नहीं हो रही है। हालात इतने खराब हैं कि बच्चे नशे का शिकार हो रहे हैं। दो जून की रोटी की जुगत में मासूमों का बचपन कचरे के ढेर और ढाबों पर खो रहा है। गरीबी और लाचारी में तमाम परिवार बच्चों को काम धंधे में लगा कर गृहस्थी की गाड़ी चला रहे हैं। एक ओर सरकार बच्चों के श्रम और शिक्षा गारंटी योजना की बात कर रही है वहीं बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ हो रहा है। ऐसे बच्चों के लिए शासन द्वारा संचालित योजनाओं का भी लाभ नहीं मिल रहा है। इससे सरकार की तमाम योजनाएं दम तोड़ती दिख रही हैं। जिले के व्यावसायिक प्रतिष्ठानों, दुकानों पर बच्चे श्रम करते देखे जा सकते हैं। इसके अलावा गरीबी और लाचारी में मजबूर परिवार के बच्चे कस्बे में विभिन्न स्थानों पर कूड़े कचरे के ढेरों में कबाड़ बीनते हुए देखे जा सकते हैं। यह बच्चे कचरे के ढेरों से लोहा और प्लास्टिक बीन कर कबाड़ के पैसों से अपनी एवं परिवार की जरूरतें पूरी करते हैं। जबकि सरकार की ओर से सर्वशिक्षा अभियान के तहत 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों को अनिवार्य रूप से शिक्षा देने की योजना प्रारंभ की है।
राज्य सरकार द्वारा पोषाहार, निशुल्क पाठ्य-पुस्तक, छात्रवृत्ति, ड्रेस, जूता-मोजा समेत अनेक लुभावनी योजनाएं बच्चों को स्कूल से जोड़ने के लिए चलाई जा रही हैं। इसके बाद भी बाल श्रमिकों की तादाद में कमी नहीं आ रही है। किंतु कतिपय बच्चों को स्कूल से कोई मतलब नहीं रह गया है। बल्कि इनके जीवन का एक ही लक्ष्य है, कचरा बीन कर गुजारा करना। ये बच्चें अपने तथा अपने परिवार का पेट पालने के लिए स्कूल जाने की बजाय कूड़े के ढ़ेर पर से प्लास्टिक की बोतलें को बीनने को विवश है। ये बच्चें अपने तथा अपने परिवार का पेट पालने के लिए स्कूल जाने की बजाय कूड़े के ढ़ेर पर से प्लास्टिक की बोतलें को बीनने को विवश है।
अभिभावकों की विवशता बच्चों के लिए अभिशाप
बचपन से ही घर से बाहर निकल कर नगर और गांव में घूम-घूम कर कचरा बीनने वाले तमाम बच्चें नाजुक उम्र में ही नशे का शिकार हो रहे हैं। अभिभावकों की ओर से ध्यान न दिए जाने आलम यह है कि बीड़ी, सिगरेट एवं गुटखे का सेवन करने लगते हैं और धीरे धीरे इनकी जरूरतें इस कदर बढ़ने लगती हैं कि वह अपराध की दुनिया मे कदम रख देते हैं।
आवश्यकता है, जब तक हर बच्चा स्कूल नहीं जाता, खेल नहीं पाता और सपने नहीं देख पाता तब तक विकसित भारत की कल्पना अधूरी है।


