300 साल पुरानी विरासत: 'लघुकाशी' वैर में आस्था का रथ खींचने उमड़ा जनसैलाब, जयकारों से गूंजा आसमान
वैर / भरतपुर (कोश्लेंद्र दतात्रेय)
भरतपुर जिला मुख्यालय से 47 किलोमीटर दूर, लघुकाशी के नाम से विख्यात और श्री श्री 1008 श्री बाबा मनोहर दास जी महाराज की तपोस्थली वैर कस्बे में आस्था का एक अनूठा संगम देखने को मिला। राजा प्रताप सिंह के राजशाही जमाने से, पिछले 300 वर्षों से चली आ रही ऐतिहासिक परंपरा को निभाते हुए आषाढ़ शुक्ल द्वितीया (गुरुवार, 16 जुलाई) को भगवान श्रीराम की भव्य रथयात्रा निकाली गई।
वैदिक मंत्रोच्चार और जयकारों के साथ रवानगी
रथयात्रा का शुभारंभ सीताराम जी मंदिर प्रांगण से हुआ। यात्रा शुरू होने से पहले, विशेष रूप से सुसज्जित काष्ठ (लकड़ी) के रथ को एक ट्रैक्टर-ट्रॉली पर स्थापित किया गया। इसके बाद भगवान श्रीराम, लक्ष्मण और माता सीता के विग्रहों को वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ रथ में विराजमान कराया गया। महाआरती के बाद, पारंपरिक रूप से रैकरा चलाकर और गोला फोड़कर, 'जय श्री राम' के गगनभेदी उद्घोष के साथ रथ को रवाना किया गया।
अद्भुत नजारा: दो बड़े रस्सों के सहारे ट्रैक्टर-ट्रॉली में बंधे प्रभु के रथ को भक्तजन बड़े ही उत्साह और श्रद्धा के साथ अपने हाथों से खींच रहे थे।
कस्बे के हर कोने में हुआ भव्य स्वागत
यह रथयात्रा कस्बा वैर के विभिन्न प्रमुख मार्गों—गोपाल जी मंदिर, पुराना बाजार, चांदनी चौक, लाल चौक, जैन मंदिर, बयाना दरवाजा, विचपुरी पट्टी, नया बस स्टैंड और भुसावर दरवाजा से होती हुई देर शाम वापस सीताराम जी मंदिर प्रांगण पहुंची।
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पुष्प वर्षा और आरती: रास्ते भर कस्बा वासियों ने पलक-पांवड़े बिछाकर भगवान का इंतजार किया। जगह-जगह आरती उतारी गई, पुष्प वर्षा हुई और श्रद्धालुओं ने प्रसाद चढ़ाया।
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दीर्घायु की कामना: एक खास परंपरा के तहत, माताओं ने अपने नवजात शिशुओं को भगवान के रथ के नीचे से निकालकर उनके लंबे और स्वस्थ जीवन की कामना की।
भीषण गर्मी पर भारी पड़ी आस्था
जुलाई की भीषण गर्मी भी श्रद्धालुओं के उत्साह को कम नहीं कर सकी। बैंड-बाजों और जगह-जगह लगे डीजे पर बज रहे धार्मिक भजनों पर युवा और महिलाएं झूमते-नाचते नजर आए। पूरे कस्बे का वातावरण पूरी तरह भक्तिमय हो गया। स्थानीय लोगों ने सेवा भावना का परिचय देते हुए जगह-जगह जलपान और ठंडे पानी की व्यवस्था की थी।
सांप्रदायिक सौहार्द और आर्थिक विकास का प्रतीक
यह रथयात्रा मेला न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि भरतपुर के इस ऐतिहासिक कस्बे में सामाजिक समरसता की मिसाल भी पेश करता है। मेले में समाज की सभी जातियों, धर्मों और संप्रदायों के लोग ऊंच-नीच का भेद भूलकर एक साथ शामिल होते हैं, जिससे आपसी एकता और आत्मीयता की भावना मजबूत होती है। इसके अलावा, आस-पास के ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले हजारों लोगों के कारण यह मेला स्थानीय व्यापार और आर्थिक विकास को भी बड़ा संबल देता है।


