सील के फेर में 'बीमार' हुई अस्पताल की व्यवस्था, बिना मोहर लैब वाले नहीं लेते सैंपल, चक्कर काट रहे परिजन
डॉक्टरों के पास मोहर होने के बावजूद पर्ची पर नहीं लगा रहे, इमरजेंसी की तरफ दौड़ने को मजबूर मरीज
- जेएलएन अस्पताल में इलाज कम, मरीजों की दौड़भाग ज्यादा; दूर-दराज से आने वाले ग्रामीण भुगत रहे खमियाजा
नागौर जिला मुख्यालय के सबसे बड़े जवाहरलाल नेहरू (जेएलएन) अस्पताल में इन दिनों मरीजों का इलाज कम और चक्कर ज्यादा लग रहे हैं। अस्पताल प्रशासन की लचर व्यवस्था के कारण मरीजों और उनके परिजनों का डॉक्टर के कमरे से लेकर जांच लैब और इमरजेंसी वार्ड के बीच फुटबॉल बनना मजबूरी बन गया है। पूरा मामला डॉक्टर की पर्ची पर लगने वाली एक अदद सील (मोहर) से जुड़ा है, जिसे लगाने में डॉक्टर लापरवाही बरत रहे हैं।
लंबी लाइनों के बाद भी राहत नहीं अस्पताल की इस कछुआ चाल और संवेदनहीन व्यवस्था के कारण मरीजों को पहले लंबी कतारों में लगकर डॉक्टर को दिखाना पड़ता है। डॉक्टर मरीज को देखने के बाद जांच तो लिख देते हैं, लेकिन पर्ची पर अपने पद की सील नहीं लगाते। जब थक-हारकर मरीज या उसके परिजन जांच करवाने लैब पहुंचते हैं, तो वहां तैनात स्टाफ बिना सील के सैंपल लेने से साफ मना कर देता है।
मजबूरी में इमरजेंसी की तरफ दौड़ लैब से दुत्कारे जाने के बाद मरीजों को मजबूरी में सील लगवाने के लिए अस्पताल के एक कोने से दूसरे कोने यानी इमरजेंसी वार्ड की तरफ दौड़ना पड़ता है। वहां से जैसे-तैसे सील लगवाने के बाद मरीज दोबारा थका-हारा लैब पहुंचता है। इस पूरी दौड़भाग में न केवल मरीज की परेशानी दोगुनी हो जाती है, बल्कि गंभीर मरीजों के इलाज में भी घंटों की देरी हो रही है।
अस्पताल में मौजूद एक पीड़ित परिजन का कहना है कि- "डॉक्टरों के पास टेबल पर सील उपलब्ध है, लेकिन वे इसे पर्ची पर ठप्पा लगाने की जहमत नहीं उठा रहे। उनकी इस मामूली सी लापरवाही की कीमत दूर-दराज के गांवों से आने वाले गरीब मरीजों को भुगतनी पड़ रही है।"
अस्पताल प्रशासन मौन, कब सुधरेंगे हालात? हैरानी की बात यह है कि डॉक्टरों के पास उनकी सील उपलब्ध है, इसके बावजूद वे इसे पर्ची पर नहीं लगा रहे हैं। अस्पताल में रोज सैकड़ों मरीज इस अव्यवस्था का शिकार हो रहे हैं, लेकिन अस्पताल प्रशासन आंखें मूंदे बैठा है। स्थानीय लोगों ने मांग की है कि पीएमओ (PMO) तुरंत इस मामले में हस्तक्षेप करें और डॉक्टरों को पर्ची पर सील लगाने के सख्त निर्देश दें, ताकि मरीजों को इस मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना से राहत मिल सके।


