तेजी से बढ़ते घूंसखोरी के जाल से नैतिकता हों रहीं समाप्त - मीणा

Feb 28, 2022 - 16:33
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तेजी से बढ़ते घूंसखोरी के जाल से नैतिकता हों रहीं समाप्त - मीणा
फोटो: लेखन-रामभरोस मीणा *पर्यावरण कार्यकर्ता व समाजसेवी)

मानव के विकास के साथ आध्यात्मिक अध्यन से समय को चार भागों में विभाजित किया सतयुग द्वापर, त्रेता, , कलयुग (कला, विज्ञान का समय) । वर्तमान समय को कलयुग कहां गया लेकिन यथार्थ में यह कला विज्ञान का युग है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति अपनी एक अलग पहचान बनाने के साथ विकास की कोशिश में रहते भौतिक सुख सुविधाओं को भोगने के लिए प्रतिशत से बच नहीं रहा। श्रमिक, नोकर, अधिकारी, नेता, प्रशासक, शासक के साथ आज धर के रसोईया भी लिप्त है। प्रतिशत (नस्पत, हिस्सा, घूसखोरी) शब्द को "परिभाषित" किया जाए तो साफ होता है "व्यक्ति अपनी शुद्ध  कमाई के बावजूद जो काम के बदले दुसरो से प्राप्त करता हिस्सा, घुस खोरी, नस्पत, प्रतिशत है"।

हिस्सा लेना देना नई परिपाटी नहीं यह आदि अनादि काल से चली एक परम्परा है जिसें लेकर हमेशा तनाव रहा, आम जन से लेकर शासन तक परेशान रहते आएं, बावजूद इसे खत्म नहीं किया जा सका। सतयुग के समय राक्षसों से देवता व ऋषि मुनि घबरायें हुए थे, उन्होंने अपने बचाव के लिए अनेकों "सद्बुद्धि यज्ञ" किए। देत्यों से अपनी व सम्पत्ति की रक्षा, आम नागरिक की सुरक्षा को लेकर ऋषियों मुनियों द्वारा ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों से सुरक्षा की मांग करते रहे। भगवान शिव भी अपने आप में परेशान थे। द्वापर युग में श्री कृष्ण के दरबार में घुस खोरों का जन्म हुआ, उसे मिटाने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने "नैतिक मूल्यों " के विकास पर ज़ोर देकर हर व्यक्ति को मानवता का पाठ पढ़ाया। त्रेता युग में भगवान श्री राम भी इन्हें रोकने के लिए प्रयास किए, अपने शासनकाल में इन्होंने भी मर्यादाओं को बनाएं रखने का प्रयास किया।घुस खोरी कम रही।
कल युग जो वर्तमान में चल रहा है इसके प्रारंभ से वर्तमान तक के आपसी अनुभवों को साझा करने के साथ लोगों में किंवदंतियों, कहानीयों के साथ वर्तमान को पढ़ा जाएं, घुस खोरी का प्रतिशत  चर्म सीमा पर पहुंच चुका। 
बढ़ते प्रतिशत (घुस) को सामाजिक, प्रशासनिक, शासकीय स्तर से देखा जाए 95 प्रतिशत काम प्रशासनिक स्तर पर घूसखोरी के बगैर नहीं हो पा रहे। शासकीय स्तर पर परियोजनाओं के संचालन में सौदा 100 प्रतिशत के साथ देश की योजना परियोजना, महायोजना उपर से नीचे तक सौदा किए बिना पुरी नहीं हो रही। "आम व्यक्ति इस व्यवस्था से त्रस्त हो रहा, मेहनती पिछड़ रहा, निठल्ले योग्य " कहला रहें। पुर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी ने घुसखोरी के बढ़ते प्रचलन को लेकर कहां था की विकास के नाम केन्द्र से चलें सो रुपए लाभार्थियों तक पहुंचते 15 रुपए रह जाते हैं, उन्होंने इसे सुधारने के लिए अपील की। प्रतिशत कम करने का निर्णय सभी लेते खत्म करने पर कोई विचार नहीं। 
शहर, गांव, ढाणी, घर, परिवार, व्यक्ति के पास सीधे लाभ पहुंचाने के जितने प्रयास हुए शोषण उसी प्रतिशत में बढ़ता चला।  विकास कार्यों में ठेका प्रथा चर्म सीमा पर पहुंच गई। प्रत्येक काम अधिकारी कर्मचारी स्वयं नहीं कर ठेकेदारों को पनाह देने लगें। योग्य युवक-युवतियां बेरोजगार बैठे आए दिन जीवन लीला समाप्त कर रहे अयोग्य बैंकडोर से प्रशासनिक अधिकारी बन रहें, इमानदार व्यक्ति कर्ज के ब्याज में डुबकी लगा बैठा, माल्या जैसे देश लुट कर विदेश में कारोबार चला बैठे, लगता है यहां भी घपला है। देश की सुरक्षा के लिए मिशाइल खरीदें या उत्पादन के लिए उधोगों की स्थापना सभी में प्रतिशत का बोलबाला नजर आने के साथ  घपलों, भगोड़ों, लुटेरों का देश बन गया।
घुस खोरी हर समय,हर युग में रहीं "आंटे में नमक जीतनी", वर्तमान में इसकेे विपरीत है यहां "नमक में आटा" डाला जा रहा है जो "नैतिकता के पतन" के साथ ही आम जन, देश व देश के शासकों के लिए शर्मशार बात है। घुस खोरी के बढ़ते जाल में हर व्यक्ति, समाज, परिवार, शासक, प्रशासक उलझे हुए हैं। यह उलझन 2001 के बाद तेज़ गति से बढ़ती हुई आज एक समस्या बन गई जो आम जन सहित देश के लिए खतरा है, वर्तमान समय में शासकों, प्रशासकों को चाहिए कि वे इस समस्या का हल निकालें। यदि घुस खोरी को लेकर कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए तों आने वाले समय में देश में गृह कल्ह बढ़ने की सम्भावनाओं से नकारा नहीं जा सकता। इसलिए हमें घुस खोरी को रोकने के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए।

लेखन: रामभरोस मीणा
पर्यावरण कार्यकर्ता व समाजसेवी

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