छोटे दुकानदारों की बचत से 24000 करोड रुपए का साम्राज्य सबसे बड़ा कारपोरेट विवाद, निवेशक परेशान
नईदिल्ली (कमलेश जैन) छोटे कस्बों के दुकानदार, रेहड़ी लगाने वाले, किसान और निचले मिडिल क्लास परिवार उनकी जेब से रोज के 10 या 20 रुपये की बचत निकलती थी, जो एक एजेंट के पास जमा हो जाती थी। किसी ने सोचा भी नहीं था कि यही छोटी छोटी रकम मिलकर एक दिन हजारों करोड़ रुपये का कारोबारी साम्राज्य खड़ा कर देगी।उस दौर में बैंकिंग सिस्टम गांवों तक इतना मजबूत नहीं था, और सहारा ने इसी भरोसे के गैप को अपना बिजनेस मॉडल बना लिया।
धीरे धीरे यह सिस्टम इतना बड़ा हो गया कि सहारा भारत के सबसे बड़े पैरा बैंकिंग नेटवर्क में गिना जाने लगा। रिपोर्ट्स के मुताबिक, कंपनी के पास करीब 12 लाख से ज्यादा एजेंट और कर्मचारी थे, और निवेशकों की संख्या 3 करोड़ से ज्यादा बताई जाती थी.
जब छोटी बचत अरबों में बदल गई
साल 2000 के दशक के आखिर तक सहारा ने अपने फाइनेंशियल प्रोडक्ट्स के जरिए करीब 24,000 करोड़ रुपये से ज्यादा जुटा लिए थे। यह पैसा सहारा की दो कंपनियों SIRECL और SHICL के जरिए ओएफसीडी स्कीम से लिया गया था। यह उस दौर के लिहाज से भारत के सबसे बड़े अनरेगुलेटेड फंड रेजिंग मामलों में से एक था।
सिर्फ रियल एस्टेट में ही सहारा ने हजारों करोड़ रुपये लगाए पुणे के पास एम्बी वैली जैसे लग्जरी टाउनशिप प्रोजेक्ट पर करीब 10,000 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च होने का अनुमान लगाया जाता है। इसके अलावा न्यूयॉर्क के प्लाजा होटल और लंदन के ग्रोसवेनर हाउस जैसी ग्लोबल प्रॉपर्टीज पर भी सैकड़ों करोड़ रुपये लगाए गए।
2012 में सुप्रीम कोर्ट ने सहारा को आदेश दिया कि वह निवेशकों के पैसे 15 प्रतिशत ब्याज के साथ सेबी के पास जमा करे। कोर्ट के हिसाब से सहारा को करीब 24,000 करोड़ रुपये मूल रकम और ब्याज मिलाकर इससे भी ज्यादा लौटाने थे।यह भारत के कॉरपोरेट इतिहास के सबसे बड़े रिफंड ऑर्डर्स में से एक था। सहारा ने दावा किया कि उसने करोड़ों निवेशकों को पहले ही पैसा लौटा दिया है, लेकिन सेबी ने कहा कि निवेशकों का डेटा अधूरा और संदिग्ध है। हजारों पन्नों के फॉर्म, फर्जी पते और गलत दस्तावेजों ने इस केस को और रहस्यमय बना दिया।
जेल, संपत्तियां और कैश का संकट
2014 में जब सुब्रत रॉय कोर्ट में पेश नहीं हुए, तो उन्हें गिरफ्तार कर तिहाड़ जेल भेज दिया गया। इस दौरान सहारा की कई संपत्तियां कुर्क की गईं और बेचने की प्रक्रिया शुरू हुई। प्लाजा होटल और अन्य ग्लोबल एसेट्स बेचकर भी सेबी के आदेश का पैसा पूरा नहीं हो पाया।
आज भी फंसा है हजारों करोड़ का सवाल
2026 तक आते आते सरकार के मुताबिक करीब 25,000 करोड़ रुपये का मामला अब भी विवाद और रिफंड प्रोसेस में फंसा हुआ है।सरकार ने सीआरसीएस सहारा रिफंड पोर्टल के जरिए छोटे निवेशकों को पैसा लौटाने की प्रक्रिया शुरू की है, लेकिन अब तक लौटाया गया पैसा कुल फंसी रकम का छोटा हिस्सा ही है।
छोटी बचत से शुरू हुई यह कहानी हजारों करोड़ रुपये के साम्राज्य और फिर हजारों करोड़ के विवाद में बदल गई। यह सिर्फ एक कंपनी की कहानी नहीं है, बल्कि भारत के फाइनेंशियल सिस्टम, रेगुलेशन और आम निवेशक के भरोसे की सबसे बड़ी परीक्षा की कहानी है। आज भी इसमें निवेशकों के पैसे अटके पड़े हुए हैं। जब रोज के 10 रुपये से 24,000 करोड़ रुपये तक का सफर तय हो सकता है, तो एक गलती से वही पैसा पूरे देश की सबसे बड़ी कानूनी जंग में भी बदल सकता है।


