वन्य जीवों को जहरीले पानी से बचाना जरूरी - राम भरोस मीणा
अलवर (राम भरोस मीणा) सरिस्का बाघ परियोजना के बीचों बीच होकर बहने वाली गंगा समान रुपारेल नदी वर्तमान में घरेलू सीवरेज कुटीर उद्योग के दूषित गंदे कैमिकल इस्तेमाल हुए पानी को साथ लेकर सरिस्का के बीचों बीच से बह रही है जो अभयारण्य क्षेत्र में स्वच्छंद विचरण करने वाले वन्य जीवों के लिए ख़तरनाक हो सकती है, यह सही भी साबित हो सकता है, क्योंकि हाल ही राजस्थान राज्य प्रदुषण नियंत्रण मण्डल की रिपोर्ट ने खुलासा किया कि तेरह नदियों के लिए सत्ताइस सेंपलों में बायोकेमिकल आंक्सिजन डिमांड (बीओडी) की मात्रा अधिक मिलीं है जिससे नदियों का पानी पीना दुर की बात उससे स्नान भी करना खतरनाक हो सकता है और यह हालात हैं कोठारी, बेडच, लूणी, चम्बल, खारी, पिपलाज, हेमावास जैसी नदियों के जिनका बीडीओ 2.0 से 4.1 तक पाया गया है।
वर्तमान में अलवर जिले की एतिहासिक नदी तथा अलवर के जयसमंद बांध के पानी का मुख्य स्रोत रहीं रुपारेल अपने उद्गम से महज़ पांच किलोमीटर दूर हीं नगरपालिका थानागाजी के गन्दे सिवरेज नालों से अपने आप को नहीं बचा सकी, नदी में गेंद नालों के पानी आने तथा वर्तमान में वर्षा जल के साथ बह कर सरिस्का के प्राकृतिक झीलों गार्ज नालों में एकत्रित होने से वन्य जीव इसका पेयजल के रुप में उपयोग कर रहे हैं जिससे जानवरों में टीबी, केंसर, चर्म, पागलपन जैसे रोगों के साथ उनकी पाचनशक्ति कमजोर हो सकती है जो सिड्यूल प्रथम के जानवरों के ज्यादा नुक्सान पहुंचा सकते हैं।
नदी में बड़ते प्रदुषण तथा वन्य जीवों पर आगामी समय में पड़ने वाले प्रभावों से चिंता जाहिर करते हुए एल पी एस विकास संस्थान के प्रकृति प्रेमी राम भरोस मीणा ने कहा कि नदियों का स्वच्छ रहना बहुत जरूरी है, इनके दूषित होने से वन्य जीवों वनस्पतियों व मानव पर सीधा प्रभाव पड़ता है, रुपारेल नदी में दिनों दिन प्रदुषण बड़ता जा रहा है जो चिंताजनक है नदी की स्वच्छता के लिए ठोस कदम उठाए जाने चाहिए।

