आत्म मंथन की दिव्या झलक दिखाते हुए 78 में वार्षिक निरंकारी संत समागम का भव्य शुभारंभ

  निरंकार से जुड़कर ही हो पाएगा आत्म मंथन

Oct 31, 2025 - 15:10
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आत्म मंथन की दिव्या झलक दिखाते हुए 78 में वार्षिक निरंकारी संत समागम का भव्य शुभारंभ

खैरथल ( हीरालाल भूरानी ) आत्म मंथन एक भीतर की यात्रा है इसे केवल चंचल मन और बुद्धि के स्तर से नहीं तय किया जा सकता इसके लिए अपने अंदर आध्यात्मिक रूप में मंथन करने की जरूरत है यह उद्गार सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज ने 31 अक्टूबर से 3 नवंबर तक चलने वाले 78वें वार्षिक निरंकारी संत समागम के पहले दिन मानवता के नाम अपना पवन संदेश प्रसारित करते हुए व्यक्त किया 
सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज एवं आदरणीय निरंकारी राज पिताजी के पावन छत्र  छाया में आयोजित हो रहा है।
 सदगुरु माताजी ने अपनी बात को स्पष्ट करते हुए कहा कि हर मानव के अंदर और बाहर एक सत्य निवास करता है जो स्थिर और शाश्वत है इसी सत्य को पहले जानना होगा जब मनुष्य को हर किसी के अंदर इस सत्य का दर्शन होगा तो फिर उसके मन में सबके प्रति प्रेम का भाव उत्पन्न होगा वास्तव में परमात्मा ने मनुष्य को इस तरह ही बनाया है जिससे उसके मन में प्रेम भाव की प्राथमिकता हो लेकिन अज्ञानता के कारण मनुष्य एक दूसरे से नफरत करने के कारण ढूंढ लेता है ।

 अंत में सतगुरु माता जी ने पूरे संसार के लिए यही प्रार्थना की कि मनुष्य मानवता की राह पर चले, अंदर से खुद का सुधार करते हुए जाए ताकि सुधार का दायरा बढ़ाते हुए पूरे संसार में सुधार हो सके जिससे संसार में अमन एवं भाईचारे का वातावरण स्थापित हो सके 
इससे पूर्व समागम स्थल पर आगमन होते ही सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज का स्वागत संत निरंकारी मंडल के प्रधान श्रीमती राजकुमारी जी ने फूलों की माला पहनकर और मंडल की सचिव डॉक्टर प्रवीण खुल्लर  ने फूलों का गुलदस्ता भेंट करके किया जबकि आदरणीय निरंकारी राजापिता रमित जी का स्वागत संत निरंकारी मंडल के सीनियर एग्जीक्यूटिव मेंबर अशोक मनचंदा  ने फूलों की माला पहनकर और विदेश विभाग के मेंबर इंचार्ज  विनोद बोहरा ने फूलों का गुलदस्ता भेंट करके किया ।
 यहां पहुंचते ही सतगुरु माता जी एवं आदरणीय निरंकारी रात पिताजी का स्वागत निरंकारी इंस्टीट्यूट आफ म्यूजिक एंड आर्ट्स की 2500 से भी अधिक छात्रों ने भरतनाट्यम एवं स्वागत गीत द्वारा किया ।दिव्य युगल का सानिध्य पाकर पंडाल में उपस्थित श्रद्धालु भक्तों की नयनो से आनंद की धारा प्रकट हो रही थी। दिव्यता का यह अनुपम नजर प्रेम भक्ति की अनुभूति से सरबोर हो रहा था विभिन्न संस्कृतियों के भक्त अपनी जाति ,धर्म ,भाषा को बु भूलाकर केवल प्रेम भक्ति में सराबोर थे ।

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