अश्रुपूरित विदाई अजित पवार: पंचतत्व में विलीन हुए 'दादा', बारामती के जनसैलाब ने नम आंखों से कहा अलविदा
बारामती (शशि जायसवाल) महाराष्ट्र की राजनीति के एक कद्दावर स्तंभ और बारामती के लाडले 'दादा' का आज राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया।
केटवाड़ी फार्म से शुरू हुई उनकी अंतिम यात्रा में उमड़े जनसैलाब ने यह साबित कर दिया कि वे केवल एक नेता नहीं, बल्कि लाखों लोगों की उम्मीद और पहचान थे। विद्या प्रतिष्ठान के मैदान पर जब उन्हें मुखाग्नि दी गई, तो समूचा महाराष्ट्र शोक की लहर में डूब गया।
थम गई बारामती की रफ़्तार
सुबह से ही बारामती की सड़कें खामोश थीं और बाजार पूरी तरह बंद रहे। जैसे ही फूलों से सजा वह ट्रक बाहर निकला जिस पर 'दादा' का पार्थिव शरीर रखा था, सिसकियां नारों में बदल गईं। "अजित दादा अमर रहें" के उद्घोष से आसमान गूंज उठा। अंतिम विदाई देने के लिए छतों, पेड़ों और सड़कों के किनारों पर लोग घंटों पहले से खड़े थे। भीड़ का आलम यह था कि केटवाड़ी से विद्या प्रतिष्ठान तक का सफर तय करने में घंटों लग गए।
राजनीति के मतभेद हुए धुंधले
अंतिम संस्कार के समय राजनीति की सरहदें सिमटती नजर आईं। एक ओर जहां मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, एकनाथ शिंदे और केंद्रीय मंत्री अमित शाह मौन खड़े थे, वहीं शरद पवार और उद्धव ठाकरे की मौजूदगी ने माहौल को और भी गंभीर बना दिया। पक्ष-विपक्ष के तमाम दिग्गजों की नम आंखें इस बात की गवाही दे रही थीं कि व्यक्तिगत संबंधों के आगे राजनीति बहुत छोटी है।
भावुक कर देने वाले पल: जब बहन बनी ढाल
संस्कार स्थल पर सबसे हृदयस्पर्शी दृश्य तब दिखा जब सुनेत्रा पवार का धैर्य जवाब दे गया। उस कठिन घड़ी में सुप्रिया सुले ने आगे बढ़कर उन्हें संभाला। पार्थ और जय पवार के आंसू पोंछती अपनी बुआ (सुप्रिया सुले) को देखकर वहां मौजूद हर शख्स की आंखें भर आईं। पारिवारिक मतभेदों को किनारे रख सुप्रिया ने पूरे परिवार के लिए एक मजबूत संबल की भूमिका निभाई।
एक युग का अवसान
राजकीय सम्मान के साथ दी गई अंतिम सलामी के बाद जैसे ही चिता को अग्नि दी गई, बारामती के एक स्वर्णिम युग का अंत हो गया। लोग भारी मन से वापस लौट रहे थे, लेकिन हवा में अब भी 'दादा' की यादें और उनके द्वारा किए गए विकास कार्यों की चर्चाएं जीवित थीं।