बेसहारा लोगों की अंतिम यात्रा का सहारा बनीं दो महिलाएं: हजारों को दी सम्मानजनक विदाई,निभा रहीं 'क्रांतिकारी' बेटों का फर्ज
उत्तर प्रदेश: (शशि जायसवाल) हर इंसान की तमन्ना होती है कि जब वह इस दुनिया से जाए तो उसे अपनों का कंधा मिले। पूरे सम्मान और विधि-विधान के साथ अंतिम संस्कार हो। लेकिन हर किसी की किस्मत में ऐसा नहीं होता…।
समाज में जहां अक्सर लोग अनजान लोगों की मदद से कतराते हैं, वहीं उत्तर प्रदेश की दो महिलाओं ने एक ऐसी मिसाल पेश की है जिसे सुनकर हर कोई उन्हें सलाम कर रहा है। गोरखपुर की पुष्पलता सिंह (अम्मा) और मुजफ्फरनगर की शालू सैनी उन लावारिस शवों का अंतिम संस्कार कर रही
, जिनका इस दुनिया में कोई नहीं है।
कई लोग गुमनामी में इस दुनिया से चले जाते हैं, जिनके शवों को लेने वाला तक कोई नहीं होता। ऐसे लावारिस शवों की अंतिम विदाई की जिम्मेदारी उठाती हैं गोरखपुर की पुष्पलता सिंह और मुजफ्फरनगर की शालू सैनी।
कौन हैं ये दो बहादुर महिलाएं?
1. पुष्पलता सिंह 'अम्मा' (गोरखपुर): पुष्पलता एक सरकारी स्कूल में टीचर हैं और काफी पढ़ी-लिखी (M.Sc. Zoology) हैं। पिछले 15 सालों से वे समाज सेवा में लगी हैं।
खास काम: वे अब तक 250 से ज्यादा लावारिस शवों का अंतिम संस्कार कर चुकी हैं।
अनोखी परंपरा: वे शवों की राख को संभालकर रखती हैं और साल में एक बार काशी जाकर गंगा में प्रवाहित करती हैं।
2. शालू सैनी 'क्रांतिकारी' (मुजफ्फरनगर): शालू सैनी एक साधारण परिवार से हैं और अपना घर चलाने के लिए ठेला लगाती हैं। उन्होंने कोरोना काल के कठिन समय में अपनी जान की परवाह किए बिना लोगों की सेवा की।
बड़ी उपलब्धि: उन्होंने अब तक 6,000 से ज्यादा शवों का अंतिम संस्कार किया है।
विश्व रिकॉर्ड: उनके इस साहस के लिए उनका नाम 'गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड' में भी दर्ज है।
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर पढ़िए इन दोनों महिलाओं की कहानी… कैसे इन्होंने समाज की परंपराओं से अलग हटकर यह जिम्मेदारी उठाई, आखिर इन्हें इस सेवा की प्रेरणा कहां से मिली?
बीमार बुजुर्ग ने बदली जिंदगी गोरखपुर की पुष्पलता कहती हैं कि करीब तीन साल पहले उन्होंने सड़क किनारे एक बुजुर्ग को बेहद बीमार हालत में देखा। उन्होंने बुजुर्ग को उनकी हालत पर नहीं छोड़ा। अपने साथ घर ले आईं और उनका इलाज कराया।
बुजुर्ग का करीब एक साल तक इलाज कराया। बाद में बुजुर्ग की मौत हो गई। तब पुष्पलता ने ही उनका अंतिम संस्कार किया। यही वह पल था, जब उनके मन में यह विचार आया कि जिन लोगों का इस दुनिया में कोई नहीं है, उनकी अंतिम विदाई भी सम्मान के साथ होनी चाहिए। तभी से उन्होंने लावारिस शवों का अंतिम संस्कार करने का संकल्प ले लिया।
गरीब और बेसहारा लोगों के लिए भी सहारा पुष्पलता सिंह सिर्फ लावारिस शवों का अंतिम संस्कार करने तक ही सीमित नहीं हैं। सड़क पर कोई लाचार या बीमार व्यक्ति मिल जाए तो उसकी सेवा करती हैं और जरूरत पड़ने पर उसे अपने साथ घर ले आती हैं।
पुष्पलता बताती हैं- मेरी इस मुहिम से अब तक करीब 5 हजार लोग जुड़ चुके हैं। हालांकि, इनमें से लगभग 35 से 40 लोग ही सक्रिय रूप से काम करते हैं।
कानूनी प्रक्रिया के बाद पुलिस सौंपती है शव पुष्पलता के अनुसार, जिन शवों का कोई दावेदार नहीं होता, उन्हें कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद पुलिस उनके सुपुर्द कर देती है। इसके बाद वह पूरे सम्मान के साथ अंतिम संस्कार की तैयारी करती हैं। सबसे पहले शव को साफ कर उसका साज-शृंगार करती हैं, फिर राप्ती नदी के तट पर स्थित शवदाह गृह तक ले जाती हैं। वहां अपने हाथों से शव को चिता तक पहुंचाती हैं और मुखाग्नि देकर अंतिम संस्कार की पूरी प्रक्रिया पूरी करती हैं।
- सेवा को वैधानिक रूप देने के लिए बनाई संस्थाशुरुआत में वह अपनी इच्छा से शवों का अंतिम संस्कार कराती थीं, लेकिन बाद में कानूनी प्रक्रिया को ध्यान में रखते हुए उन्होंने ‘मातृ आंचल’ नाम से एक संस्था रजिस्टर्ड कराई है। इसके जरिए यह सेवा कार्य अब पूरी तरह वैधानिक तरीके से किया जा रहा है।
- पुष्पलता कहती हैं कि वो सभी शवों की राख को संभालकर रखती हैं। मई के महीने में वह इन सभी राखों को काशी ले जाकर गंगा में प्रवाहित करती हैं। साथ ही साल में एक बार इन सभी के लिए सामूहिक ब्रह्मभोज भी कराने की योजना है, ताकि उनकी आत्मा को शांति मिल सके।
अगर किसी को बाद में अपने परिजन के बारे में जानकारी मिलती है और उनका अंतिम संस्कार उनके हाथों हो चुका है, तो वह उनसे राख भी प्राप्त कर सकते हैं।
खुद के शरीर और अंग भी दान करने का संकल्प मानवता की इसी भावना के साथ पुष्पलता ने अपने जीवन में एक और बड़ा फैसला लिया है। उन्होंने जीते-जी अपने शरीर और अंगों का दान करने का संकल्प लिया है। उनका कहना है कि जब वह इस दुनिया में न रहें, तो उनके शरीर या अंग किसी जरूरतमंद के जीवन के काम आ जाएं, इससे बड़ी संतुष्टि और क्या हो सकती है।
उनके पिता अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन जब वे जीवित थे, तब भी उन्होंने इस फैसले का कभी विरोध नहीं किया। फिलहाल पुष्पलता अपने पिता के घर में अकेली रहती हैं।
अभी तक 250 प्लस लाशों का संस्कार पुष्पलता बताती हैं कि 2025 में कुल 225 लाशों का अंतिम संस्कार किया। 2026 की शुरुआत से लेकर अभी तक 50 प्लस लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार कर चुकी हैं।
शवों का अंतिम संस्कार करने की कहां से मिली प्रेरणा? मुजफ्फरनगर की रहने वाली शालू सैनी बताती हैं कि समाजसेवा की शुरुआत अचानक हुई एक घटना से हुई। शुक्रताल इलाके में गंगा नदी में कई बार डेड बॉडी बहकर आ जाती थीं। यह इलाका खादर क्षेत्र माना जाता है, इसलिए यहां अक्सर नदी में बहकर आए शव मिलते थे।
ऐसे ही एक दिन जब उन्होंने गंगा में बहकर आए शव को देखा तो उनके मन में यह सवाल उठा कि आखिर इन लोगों का अंतिम संस्कार कौन करेगा। उसी समय से उन्होंने ऐसे शवों को सम्मान के साथ अंतिम विदाई देने का फैसला कर लिया।
केदारनाथ में आई बाढ़ में बहकर आए कई शव शालू कहती हैं कि 2013 में केदारनाथ में जब आपदा आई तो लोग बहकर अलग-अलग जगहों पर पहुंच गए थे। उस दौरान उनके इलाके में भी कुछ शव आए। उनके संस्था के लोगों ने उस बारे में उनको बताया, फिर उन्होंने उन सब का अंतिम संस्कार कराया।
कोरोनाकाल से लगातार कर रहीं शवों का संस्कार शालू कहती हैं कि जब कोरोना महामारी का दौर आया, तो लगातार यह सेवा कार्य करना शुरू कर दिया। वह कहती हैं कि कोरोना के समय सबसे ज्यादा दर्द तब हुआ, जब कई परिवार अपने ही लोगों के शवों के पास आने या छूने से डर रहे थे।
जिन लोगों के लिए परिवार ने पूरी जिंदगी मेहनत की, मौत के बाद उनसे दूरी बना ली गई। उस समय बहुत कम लावारिस शव मिलते थे, लेकिन अब उनके पास ऐसे लोग भी आते हैं, जिनके पास अंतिम संस्कार के लिए पैसे नहीं होते या जो झुग्गी-झोपड़ियों में रहते हैं। शालू सैनी के मुताबिक, कोरोना काल से लेकर अब तक वह 6 हजार से ज्यादा शवों का अंतिम संस्कार कर चुकी हैं
ठेला लगाकर चलाती हैं घर और सेवा शालू सैनी अपने परिवार का पालन-पोषण करने के लिए झांसी की रानी चौक पर कपड़ों और फास्ट फूड का ठेला लगाती हैं। इसी कमाई से वह अपने बच्चों का खर्च भी चलाती हैं और समाजसेवा का काम भी करती हैं।
वृद्धाश्रम भी शुरू किया उन्होंने बताया कि दक्षिणी कृष्णा पुरी इलाके में उनके पास एक प्लॉट था, जहां उन्होंने ‘क्रांतिकारी शालू सैनी’ के नाम से एक वृद्धाश्रम शुरू किया है। यहां बेसहारा बुजुर्गों को रखने की व्यवस्था की जा रही है।
हर महीने हरिद्वार ले जाती हैं अस्थियां शालू सैनी बताती हैं कि जिन शवों का वह अंतिम संस्कार कराती हैं, उनकी अस्थियों को हर महीने हरिद्वार ले जाकर गंगा में प्रवाहित करती हैं। वहां जाकर शांति पाठ भी कराया जाता है।
बेटे भी करते हैं मदद शालू कहती हैं कि उनकी जिंदगी में सबसे बड़ा सहारा उनके बच्चे हैं। उनके बच्चे उन्हें पूरा समर्थन देते हैं और कभी इस काम के लिए रोकते नहीं हैं। जब वह शहर से बाहर होती हैं, तो उनका 23 साल का बेटा सुमित सैनी भी इस जिम्मेदारी को निभाता है और जरूरत पड़ने पर अंतिम संस्कार का काम कर देता है।
राज्यपाल ने किया सम्मानित -इनके निस्वार्थ सेवा भाव को देखते हुए उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने भी इन्हें सम्मानित किया है। आज ये दोनों महिलाएं पूरे देश के लिए प्रेरणा बन गई हैं।