14 लाख शिक्षकों के संगठन ABRSM की केंद्र से गुहार: TET फैसले से प्रभावित शिक्षकों के लिए मानसून सत्र में लाया जाए अध्यादेश

May 31, 2026 - 12:53
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14 लाख शिक्षकों के संगठन ABRSM की केंद्र से गुहार: TET फैसले से प्रभावित शिक्षकों के लिए मानसून सत्र में लाया जाए अध्यादेश

रूपबास (कौशलेन्द्र दत्तात्रेय) देशभर में 14 लाख से अधिक शिक्षकों का प्रतिनिधित्व करने वाले अग्रणी शिक्षक संगठन 'अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ' (ABRSM) ने शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) प्रकरण से संबंधित समीक्षा याचिका पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय के हालिया निर्णय से उत्पन्न विषम परिस्थितियों को लेकर गहरी चिंता एवं पीड़ा व्यक्त की है।

अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ, राजस्थान के प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य हरिशंकर शर्मा ने इस विषय में विस्तृत जानकारी देते हुए बताया कि माननीय न्यायालय के इस फैसले से देशभर के लाखों शिक्षकों में व्यापक असंतोष, असुरक्षा और गंभीर मानसिक तनाव की स्थिति उत्पन्न हो गई है। ये वे शिक्षक हैं जो पिछले कई वर्षों से अत्यंत समर्पण, ईमानदारी और निष्ठा के साथ देश के सुदूर ग्रामीण, शहरी और वंचित क्षेत्रों के विद्यालयों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं और राष्ट्र के निर्माण में अमूल्य योगदान दे रहे हैं।

महासंघ ने स्पष्ट किया कि प्रभावित शिक्षकों की नियुक्तियां किसी चोर दरवाजे से नहीं, बल्कि उस समय लागू सरकारी नियमों, नियमावलियों एवं अधिसूचनाओं के अंतर्गत सक्षम प्राधिकरणों द्वारा विधिवत एवं पारदर्शी चयन प्रक्रिया अपनाकर की गई थीं। अपने जीवन के महत्वपूर्ण और स्वर्णिम वर्ष शिक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ करने में समर्पित करने के बाद, आज इन शिक्षकों के सामने अचानक आजीविका का संकट खड़ा हो गया है।

महासंघ द्वारा रेखांकित मुख्य बिंदु एवं चिंताएं:

  1. अपूरणीय क्षति की आशंका: वर्तमान कानूनी स्थिति के कारण लाखों शिक्षकों को, जीवन के इस पड़ाव पर वर्षों की लंबी सेवा देने के बावजूद, ऐसी अपूरणीय क्षति उठानी पड़ सकती है जिसकी भरपाई संभव नहीं है।

  2. शैक्षणिक वातावरण पर प्रतिकूल प्रभाव: शिक्षकों की सेवा स्थितियों और भविष्य को लेकर अचानक उत्पन्न हुई इस अनिश्चितता के कारण विद्यालयों के सुचारू संचालन और समग्र शैक्षणिक माहौल पर गहरा नकारात्मक असर पड़ेगा।

  3. मानवीय दृष्टिकोण अनिवार्य: यह विषय केवल तकनीकी कानूनी या प्रशासनिक दांव-पेंच का नहीं है, बल्कि मानवीय और सामाजिक दृष्टि से भी अत्यंत संवेदनशील और महत्वपूर्ण है, जिसमें सरकार के तुरंत हस्तक्षेप की आवश्यकता है।

  4. विधायी संरक्षण का इतिहास: पूर्व में भी इस प्रकार की असाधारण परिस्थितियों में व्यापक जनहित, सामाजिक न्याय और संस्थागत स्थिरता बनाए रखने के लिए सरकारों द्वारा विधायी उपायों और संशोधनों के माध्यम से कर्मचारियों को संरक्षण प्रदान किया गया है।

हरिशंकर शर्मा (प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य, ABRSM राजस्थान) का कहना है कि - "हम भारत सरकार से पुरजोर आग्रह करते हैं कि आगामी संसद के मानसून सत्र में उपयुक्त अध्यादेश अथवा आवश्यक विधायी संशोधन लाकर इन प्रभावित लाखों शिक्षकों को तत्काल राहत व सेवा सुरक्षा प्रदान की जाए। यह कदम न केवल शिक्षकों के मानवीय अधिकारों की रक्षा करेगा, बल्कि देश की प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा क्षेत्र में निरंतरता एवं स्थिरता भी सुनिश्चित करेगा।" — 

ABRSM ने देश के प्रधानमंत्री और केंद्रीय शिक्षा मंत्री पर पूरा विश्वास जताते हुए कहा है कि सरकार शिक्षकों की वास्तविक भावनाओं, उनकी पीड़ा और चिंताओं के प्रति सदैव संवेदनशील रही है और इस विषय में भी सहानुभूतिपूर्वक व ठोस निर्णायक कदम उठाएगी। शिक्षक सदैव राष्ट्र की रीढ़ रहे हैं और वे न्याय तथा आजीविका सुरक्षा के पूर्ण अधिकारी हैं।

शांतिपूर्ण आंदोलन की चेतावनी: महासंघ ने अत्यंत सम्मानपूर्वक परंतु दृढ़ता के साथ यह भी कहा कि यदि लाखों पीड़ित और मानसिक रूप से प्रताड़ित शिक्षकों को समय रहते विधायी राहत प्रदान नहीं की गई, तो वे अपने मौलिक अधिकारों, सम्मान और आजीविका की रक्षा हेतु राष्ट्रव्यापी स्तर पर लोकतांत्रिक, संवैधानिक एवं शांतिपूर्ण आंदोलन करने के लिए बाध्य हो सकते हैं।

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