संस्कृति एवं धर्म की रक्षा का संकल्प है-रक्षाबंधन पर्व

Aug 8, 2025 - 14:36
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संस्कृति एवं धर्म की रक्षा का संकल्प है-रक्षाबंधन पर्व

पर्व हमारे लिए प्रकाश देते हैं, प्रेरणा देते हैं। पर्व का अर्थ यही है कि जो किसी को  जोड़ दे। यह पर्व कभी हमें संस्कृति से जोड़ता है। तो कभी इतिहास से जोड़ेता है। कभी-कभी धार्मिक और सामाजिक परम्पराओं से जोड़ता हैं। रक्षाबंधन पर्व ही नहीं अपितु महापर्व है। महापर्व है क्योंकि सांस्कृतिक हो ऐतिहासिक हो धार्मिक और सामाजिक भी हो। 
यह पर्व दूसरों के दुख में सम्मिलित होने का पर्व है। अपनी पीढ़ा से पशु पक्षी भी कराह उठते हैं। लेकिन इंसान पर पीढ़ा से सिहर उठे वह धरती पर देवता के समान है। भारत त्योंहारों का देश है त्योहारों के माध्यम से संस्कृति को संरक्षण एवं संवर्द्धन प्रदान किया जाता है। रक्षाबंधन पर्व भारतीय संस्कृति का सबसे महान पर्व है क्योंकि किसी पर्व में हम घर को सजाते हैं तो किसी त्योंहार में नये कपड़े पहने की परम्परा है किन्तु रक्षाबंधन ही एक मात्र पर्व है जो हमें दूसरों के प्रति वात्सल्य एवं करूणा का संदेश देता है। 
महिलायें समाज का अभिन्न अंग है इनके बिना मानव जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। इसके बाद भी कुछ दूषित मानसिकता वाले पुरूषों व मनचले युवकों द्वारा पूरी महिला समाज भय और आतंक के माहौल में जीने को मजबूर है आज बलात्कार व छेड़छाड़ की घटनायें सुनने एवं देखने को टीवी एवं दैनिक पत्रों के माध्यम से प्रतिदिन मिलती है। यह पर्व हमें पुनः जागृत करने एवं संस्कृति से जोड़ने के लिए आता है। महिलाओं की इज्जत एवं अपनी बहिन बेटियों की सुरक्षा के लिए समाज के सभी वर्ग के लोगों को एक सूत्र में बधनें की आवश्यकता हैै तभी हम पुनः एक सभ्य और सुरक्षित समाज का निर्माण कर सकते हैं भारतीय संस्कृति में बहिन बेटियों को दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती व देवी का दर्जा दिया जाता है। नवरात्रों में हम बालिकाओं को बुला करके भोजन कराके व उनके चरणों की पूजा करके अपने व्रत की पूर्ति करते हैं। 
प्रतिष्ठाचार्य श्री विजय कुमार जैन ने आगम के अनुसार बताया कि जैन धर्म में रक्षाबंधन पर्व का महत्व बहुत ही विशेष है। जैन मान्यता के अनुसार यह पर्व संस्कृति और धर्म की रक्षा का पर्व है। एक समय हस्तिनापुर नगरी में अकम्पनाचार्य आदि 700 मुनियों के ऊपर 4 मंत्रियों ने भीषण उपसर्ग किया वह मुनिराज जहाॅं बैठे तप कर रहे थे उनको चारों तरफ से घेर करके अग्नि जला करके हवन का नाम देकर के उन पर प्राणघातक उपसर्ग कर रहा था जैन मुनि उपसर्ग समझ करके ध्यान में लीन हो गये एवं उपसर्ग निवारण होने तक आहार और जल का त्याग कर दिया। उसी समय विष्णु कुमार मुनि जो कि तपस्या में लीन थे उन्हें क्षुल्लक पुष्पदंत महाराज ने सम्बोधन किया कि हे महामुनि हस्तिनापुर नगरी में 700 मुनियों के ऊपर उपसर्ग किया जा रहा जिसका निवारण इस समय सिर्फ आपके द्वारा ही हो सकता है। चूंकि आपको तप करते-करते अनेक प्रकार की शक्तियाॅं प्राप्त हो चुकी हैं जिनके माध्यम से आप तत्क्षण वायु मार्ग से जा करके उनकी रक्षा कर सकते हैं। 
बिना समय गवाये विष्णु कुमार मुनि बामन का रूप धर करके हस्तिनापुर नगरी में पहुॅंच जाते है एवं उच्च स्वर से संस्कृत के श्लोकों का उच्चारण करने लग जाते हैं। बामन का आकषर्ण रूप देखकर चारों मंत्री मुग्ध हो जाते है एवं उनसे मन चाहा वरदान मांगने का निवेदन करते हैं। बामन राज वरदान में तीन पैर धरती मांग लेते हैं। वो चारों मंत्री मन ही मान सोचते हैं कि बामन चाहता तो इस समय हम से पूरा गांव मांग सकता था लेकिन मात्र तीन पैर धरती ही मांग रहा है। उन्होंने निवेदन किया बामनराज आप अपने पैरों से ही तीन पग धरती नाप लें। अपनी शक्तियों से बामन ने इतना बड़ा आकार बनाया कि पहला पैर सुमेरू पर्वत पर दूसरा पैर मानुषोत्तर पर्वत पर रखा तीसरा पैर रखने की जगह नहीं बची पूरी धरती दो पैर में ही नाप ली। वे सभी हाहाकार करने लगे हे भगवन हमारी रक्षा कीजिए अपने वास्तिविक रूप में आ करके हमें दर्शन दीजिए।
उस समय विष्णुकुमार मुनि ने संबोधन दिया कि तुम्हार यज्ञ व्यर्थ है जिसमें तुम इन मुनियों को जिन्दा जला रहे हो और उस समय महामुनि विष्णुकुमार मुनि के द्वारा उनकी रक्षा की गई एवं सभी ग्राम वासियों ने आ करके उन सभी मुनियों को बचा करके उनकी यथा योग्य सेवा की एवं धुंऐ से कंठ रूध गया था इसलिए मीठी सिवई की खीर बना करके सभी साधुओं को आहार कराया। तभी से यह रक्षा बंधन महापर्व मनाया जाने लगा। वह दिन श्रावण शुक्ला पूर्णिमा का पावन दिवस था। 
वर्तमान में यह पर्व भाई-बहिनों तक ही सीमित रह गया। इस दिन बहनें अपने भाईयों को रक्षासूत्र  (राखी) बांधती हैं और वे उसके फलस्वरूप उन्हें उपहार व राशि प्रदान करते हैं। लेकिन इस त्योंहार से जुड़े हुए इतिहास को नहीं जान पाते हैं यह त्योंहार वात्सल्य एवं रक्षा का पर्व है जो हमें भाईचारे का संदेश देता है कि हमें सर्वप्रथम अपने राष्ट्र, राज्य, ग्राम की रक्षा का संकल्प लें तत्पश्चात् एक दूसरे की रक्षा का संकल्प लें। उसके पश्चात् अपने घर में इस पर्व को मनाकरके खुशहाली लायें यही इस पर्व का संदेश है। 

  • कमलेश जैन 

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