भगवान जगन्नाथ 195 वर्ष पुराने गरुड रूपी विमान पर विराजमान होंगे रथ यात्रा 16 जुलाई को
राजगढ़ (अलवर/अनिल गुप्ता) राजगढ़ कस्बे के चौपड़ बाजार स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर से 16 जुलाई को जन-जन के आराध्य देव भगवान जगन्नाथ जी की रथ यात्रा निकाली जाएगी। मंदिर के महंत ने बताया कि भगवान जगन्नाथ जी का गरूड़रूपी विमान रथ 195 वर्ष पुराना है। उसको जगन्नाथ पुरी के तर्ज पर सजाया जाएगा। उन्होंने बताया कि जगन्नाथ पुरी के बाद अलवर जिले के राजगढ़ तहसील का द्वितीय स्थान है जो भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा को पूरी परंपरा के आधार पर निभाया जा रहा है। भगवान जगन्नाथ के रथ यात्रा को 172 वर्ष हो गए। लेकिन यह गरुड़ रूपी विमान को लगभग 195 वर्ष हो गये। यह रथ 195 वर्ष पुराना है। जगन्नाथ मंदिर के सर्वप्रथम महंत केशव जी महाराज के द्वारा जगन्नाथ पुरी से आए कारीगरों के द्वारा इस रथ का निर्माण कराया गया। महंत केशव दास जी महाराज के द्वारा भगवान जगन्नाथ की सर्वप्रथम रथ यात्रा के रूप में इस रथ काम में लिया गया। प्राचीन ऐतिहासिक काल से भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा में पूर्व में हाथी, घोड़े, कच्ची घोड़ी, बम रसिया नृत्य, पलटन, बैंड आदि निकलते थे।
लेकिन समय के परिवर्तन के साथ रथ यात्रा को आकर्षक रूप मिला। भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा को नया आकर्षित रूप देने की तैयारी मेला कमेटी और मंदिर के द्वारा की जा रही है। सर्वप्रथम 1855 में भगवान जगन्नाथ की प्रथम रथ यात्रा राजगढ़ में निकाली गई। गंगा बाग स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर को लगभग 217 साल हो गए। गंगा बाग स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर है, जिसे अलवर नरेश अलवर नरेश शो दान सिंह ने संपूर्ण गंगा बाग और मंदिर भवन को भगवान जगन्नाथ जी के मेले और रथ यात्रा के लिए अर्पण कर दिया। महंत केशव दास जी के सहयोग से वर्ष 1855 में प्रथम रथ यात्रा का शुभारंभ हुआ। भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा को 172 वर्ष हो गए। पूरे भारत में जगन्नाथ पुरी के बाद अलवर जिले के राजगढ़ तहसील में ही सबसे प्राचीन भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा निकलती हुई आ रही है।
जगन्नाथ पुरी की तर्ज पर निका ली जाती है यह रथ यात्रा
मंदिर के महंत ने बताया कि जिस प्रकार जगन्नाथ पुरी में पूर्ण रीति रिवाज और परंपरा के आधार पर कार्य होता है। वही परंपरा का पूर्ण रूप से निर्वहन अलवर जिले के राजगढ़ तहसील में जगन्नाथ मंदिर में 15 दिन पूर्व भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा से 15 दिन पूर्व भगवान जगन्नाथ का 108 जल कलशों पंचामृत से अभिषेक होता है। अभिषेक के पश्चात भगवान जगन्नाथ 15 दिनों के लिए गर्भ में विराजमान रहते हैं। जहां उनका औषधि काढ़े से उपचार आदि किया जाता है। आषाढ़ शुक्ला प्रतिपदा को भगवान जगन्नाथ गर्भ ग्रह से बाहर आएंगे आते हैं और उसी दिन नेत्र उत्सव का कार्यक्रम तथा सायं काल माता जानकी की सवारी गंगा बाग स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर पहुंचती है। जहां गणेश पूजन और मंदिर मार्जन का कार्य मंदिर महंत परिवार और मेला कमेटी के सानिध्य में होता है।
16 जुलाई को भगवान जगन्नाथ जो दूल्हे के रूप में सजते हैं। उन्हें इस बार विशेष वृंदावन की शाही पोशाक धारण कराई जाएगी, जयपुर का शाही मोगरा और सऊदी अरब का खास इत्र भगवान जगन्नाथ जी महाराज को लगाया जाएगा। भगवान जगन्नाथ की और माता जानकी का वरमाला महोत्सव जो की 20 जुलाई को होगा।


