आचार्यश्री लब्धिवल्लभसूरीजी के कर कमलों से विमोचन; आधुनिक युग में युवाओं को जैन धर्म से जोड़ने में मिल का पत्थर साबित होगी पुस्तक

Jul 5, 2026 - 17:42
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आचार्यश्री लब्धिवल्लभसूरीजी के कर कमलों से विमोचन; आधुनिक युग में युवाओं को जैन धर्म से जोड़ने में मिल का पत्थर साबित होगी पुस्तक

सिरोही के कालंद्री में 'डिजिटल उपवास' पुस्तक एवं पच्चक्काण का भव्य लोकार्पण

सिरोही (राजस्थान)। सिरोही जिले के कालंद्री स्थित उज्ज्वला फार्म रिट्रीट में आयोजित त्रिदिवसीय आध्यात्मिक शिविर का माहौल रविवार को बेहद दिव्य और अलौकिक बन गया। यहाँ परम पूज्य आचार्यश्री लब्धिवल्लभसूरीजी महाराज साहेब के पावन करकमलों से 'डिजिटल उपवास' पुस्तक एवं पच्चक्काण का भव्य लोकार्पण संपन्न हुआ। इस अभिनव पुस्तक के माध्यम से साधकों को मानसिक शांति और साधना के लिए दैनिक जीवन में कुछ समय के लिए मोबाइल, कंप्यूटर जैसे डिजिटल साधनों का त्याग कर 'डिजिटल उपवास' का संकल्प (धारणा) लेने के लिए प्रेरित किया गया है।

  • आर. के. ट्रस्ट बंगलुरू की प्रेरणादायी पहल

आधुनिक तकनीक के इस दौर में जैन धर्म की अमूल्य परंपराओं को जन-जन तक सहज रूप में पहुँचाने का यह अनूठा प्रयास आर. के. ट्रस्ट बंगलुरू के संस्थापक श्रद्धेय श्री रमेश कुमार शाह द्वारा अत्यंत समर्पण और दूरदृष्टि के साथ किया गया है। लोकार्पण के उपरांत शिविर में उपस्थित सभी साधक, श्रावक और श्राविकाओं को इस पुस्तक और पच्चक्काण की पूर्ण जानकारी दी गई तथा उन्हें गुरुप्रसाद के रूप में यह भेंट की गई। जैन धर्म में पच्चक्काण का विशेष महत्व है, जिसका अर्थ किसी भी स्वाध्याय, तप या जाप को शुरू करने से पहले उसके नियमों का दृढ़ता से पालन करने का स्वसंकल्प लेना है।

  • तकनीक तभी सार्थक, जब वह आत्मजागरण का माध्यम बने: आचार्यश्री

इस अवसर पर अपने मंगलमय उद्बोधन में आचार्यश्री लब्धिवल्लभसूरीजी महाराज साहेब ने कहा, "वास्तविक आध्यात्मिकता केवल मंदिरों या प्रवचनों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन के प्रत्येक क्षण और व्यवहार को पवित्र बनाती है। जब साधना आधुनिक माध्यमों के साथ जुड़ती है, तब धर्म का प्रकाश अधिक व्यापक और प्रभावी रूप में समाज तक पहुँचता है।" उन्होंने जोर देकर कहा कि तकनीक तभी सार्थक है, जब वह आत्मकल्याण, संयम, स्वाध्याय और आत्मजागरण का माध्यम बने।

  • युवा पीढ़ी के लिए बनेगी मार्गदर्शक

पुस्तक की परिकल्पना करने वाले रमेश कुमार पी. शाह ने बताया कि यह केवल एक डिजिटल साधन नहीं, बल्कि वर्तमान युग के साधकों के लिए संयम, आराधना और आत्मानुशासन का एक जीवंत सेतु है, जो प्राचीन आध्यात्मिक परंपराओं को आधुनिक जीवन की गति के साथ जोड़ता है। इस ऐतिहासिक अवसर पर उपस्थित जनसमुदाय ने इसे आध्यात्मिक चेतना और आधुनिक तकनीक के दिव्य समन्वय का एक अविस्मरणीय उत्सव माना। जानकारों का मानना है कि इस डिजिटल युग में युवक-युवतियों को जैन धर्म से जोड़ने और उन्हें धर्म की गहराई समझाने के लिए यह पुस्तक मील का पत्थर साबित होगी।

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