खेड़ापा रामधाम में उमड़ा श्रद्धा का सैलाब: आदि आचार्य परची प्रभा ग्रंथ का विमोचन, इस वर्ष यहीं होगा संतों का चातुर्मास
खेड़ापा (बावड़ी) मिश्रीलाल लखारा । रामस्नेही संप्रदाय की प्रसिद्ध आचार्य पीठ, रामधाम खेड़ापा में आदि संस्थापक आचार्य रामदास महाराज के वार्षिक निर्वाण दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित नौ दिवसीय आषाढ़ी बरसी सत्संग महोत्सव का मंगलवार को भव्य समापन हो गया। वर्तमान आचार्य श्री पुरुषोत्तमदास जी महाराज के पावन सानिध्य में आयोजित इस महोत्सव के दौरान श्री गुरुवाणी पाठ और अखंड रामनाम जप से पूरा परिसर भक्तिमय रहा। सोमवार रात आयोजित भव्य भजन जागरण में देश भर से आए संतों और हजारों भक्तों ने हाजिरी लगाई।
'आदि साहित्य आचार्य परची प्रभा' ग्रंथ का विमोचन
जागरण की शुरुआत में रामनाम जप, आदि आचार्य वाणी पाठ और पदों का गायन किया गया। इसके बाद उत्तराधिकारी संत गोविन्दराम शास्त्री ने रामधाम की महिमा और आगामी धार्मिक आयोजनों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि इस वर्ष संतों का पावन चातुर्मास रामधाम खेड़ापा में ही आयोजित होगा। साथ ही उन्होंने 'गो सम्मान आह्वान अभियान' के द्वितीय चरण से जुड़ने और इस संदेश को जन-जन तक पहुँचाने की अपील की। इस दौरान मंच पर रामधाम के आदि साहित्य 'आचार्य परची प्रभा' ग्रंथ का विमोचन भी किया गया।
दुनिया रत्नों की खान, ज़रूरत सिर्फ सकारात्मक खोज की: आचार्य श्री
सत्संग सभा को संबोधित करते हुए आचार्य पुरुषोत्तमदास महाराज ने कहा कि यदि ईश्वर के प्रति अटूट आस्था और सेवा भाव हो, तो स्वयं विधाता व्यक्ति का मार्गदर्शन करते हैं। इसके लिए हनुमान जी की तरह सर्वोच्च समर्पण जरूरी है। वर्तमान आधुनिक युग की चकाचौंध पर मार्गदर्शन करते हुए उन्होंने कहा:
"मनुष्य को नकारात्मकता छोड़कर हमेशा सकारात्मक विचारों के साथ आगे बढ़ना चाहिए। संसार में कुछ भी अचानक नहीं होता, सब कुछ सुनियोजित है। दुनिया रत्नों की खान है, बस उन्हें खोजने के लिए मर्यादा और बोध (ज्ञान) की आवश्यकता है। ग्रंथों में माता को रत्नकुक्षी कहा गया है। एक आज्ञाकारी बेटा पिता के लिए, एक श्रेष्ठ शिष्य गुरु के लिए और एक अच्छा भाई या बेटी परिवार के लिए रत्न के समान हैं। सकारात्मक सोच ही मानव जीवन का प्रथम उद्देश्य होना चाहिए।"
पाटोत्सव, महाआरती और महाप्रसाद के साथ पूर्णाहूति
रामस्नेही संत ध्यानदास ने बताया कि मंगलवार सुबह 8 बजे बरसी पाटोत्सव के मुख्य कार्यक्रम का आयोजन हुआ। आचार्य पुरुषोत्तमदास महाराज के कर-कमलों द्वारा निज मंदिर देवालय में विशेष पूजा-अर्चना और महाआरती की गई। इसके बाद भगवान को महाप्रसाद का भोग लगाया गया, जिसे महोत्सव में पधारे देश भर के संतों, महंतों और हज़ारों श्रद्धालुओं ने पंगत में बैठकर ग्रहण किया।


