297वर्ष पुराना है भगवान जगन्नाथ महाराज का मन्दिर
मेला स्थल गंगाबाग में लगे हरे पेड़ों को समाप्त करने से उजड गया?
अलवर (अनिल गुप्ता) अलवर जिले की राजगढ़ तहसील में जगन्नाथ पुरी के तर्ज पर बना हुआ भगवान श्री जगन्नाथ जी महाराज का मंदिर पारंपरिक रीति रिवाज के अनुसार राजगढ़ के जगन्नाथ मंदिर में वर्ष में 13 प्रमुख त्योहार मनाए जाते हैं जिनमें प्रमुख तैयार है पर्व है महाप्रभु श्री जगन्नाथ की पावन पवित्र रथ यात्रा यह रथ यात्रा जगन्नाथ पुरी के तर्ज पर आषाढ़ शुक्ल द्वितीया तिथि को निकाली जाती है यह रथ यात्रा सत्य सनातन धर्म का एक प्रतीक है आषाढ़ शुक्ला प्रतिपदा से आषाढ़ शुक्ल नवमी तक जगन्नाथ महोत्सव का आयोजन होता है ज्येष्ठ पूर्णिमा तिथि के दिन जगदीश पुरी के तर्ज़ पर भगवान श्री जगन्नाथ जी महाराज को 108 जल कलशों और पंचामृत से अभिषेक कराया जाता है अभिषेक के पश्चात भगवान जगन्नाथ का गणेश रूपी श्रृंगार होता है इस दिन भगवान जगन्नाथ का गणेश रूपी दर्शन श्रद्धालु गण भक्ति मय रूप में करते हैं और उनके दर्शन करते हैं कहते हैं ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा को भगवान जगन्नाथ का प्राकट्य पर्व मनाया जाता है इस दिन भगवान जगन्नाथ का प्रादुर्भाव रूप हुआ और उसी दिन भगवान जगन्नाथ को अपने बड़े भ्राता बलभद्र बहन सुभद्रा के साथ स्नान आदि का कार्य करवाया जाता है यह स्नान मा पुण्यशाली और पवित्र रूप में होता है भगवान जगन्नाथ को अधिक स्नान करने के कारण ज्वर पीड़ा होती है औरज्वर पीड़ा से निजात दिलाने के लिए भगवान जगन्नाथ बहन सुभद्रा और बड़े भ्राता बलभद्र को गर्भ ग्रह में प्रवेश कराया जाता है यही परंपरा अलवर जिले की राजगढ़ तहसील में निरंतर 171 वर्षों से चली आ रही है जहां महंत परिवार की नौ पीढ़ियां के द्वारा इस परंपरा का निर्वहन कर रही है
राजगढ़ के जगन्नाथ मंदिर के प्रमुख महोत्सव श्री जगन्नाथ रथ यात्रा का इतिहास
आशा शुक्ल द्वितीया तिथि को भगवान जगन्नाथ की पावन पवित्र रथ यात्रा निकाली जाती है इस रथ यात्रा का शुभारंभ सर्वप्रथम 1855 में महंत केशव जी महाराज के द्वारा शुरू किया गया महंत केशव जी ने अलवर राज्य के समस्त पांच महाजन पटेल चौधरी आदि को इकट्ठा करके इस रथ यात्रा का शुभारंभ किया और साथ में यह भी निर्णय लिया की लड़की के विवाह में मेले के आयोजन हेतु एक रुपया भगवान जगन्नाथ को अर्पण हम करते रहेंगे महंत केशव के नेतृत्व में यह मेला तत्कालीन अलवर नरेश शिवदान सिंह महाराज के माध्यम से शुरू हुआ महाराज महंत जी के इस विचार से अत्यधिक प्रसन्न हुए और उन्होंने इस वर्ष भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा को शुभारंभ रूप दे दिया इस रथ यात्रा में भगवान जगन्नाथ की इस रथ यात्रा में सरकारी बंद मोरातत्व पलटन हाथी घोड़े आदि आने लगे पहले 2 वर्षों तक भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा चोपड़ा बाजार मंदिर से निकलकर कुंड की परिक्रमा लगाते हुए गोविंद देव जी मंदिर मार्ग से आते हुए पुनः श्रीजगदीश मंदिर पहुंचती थी लेकिन बाद में भगवान जगन्नाथ की यह रथ यात्रा गंगा बाग स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर पहुंचने लगी
गंगा बाग स्थित मंदिर पहुंचने का इतिहास
यह है की महंत केशव जी महाराज के द्वारा जब यह परंपरा शुरू की गई तो महाप्रभु की इस रथ यात्रा को एक विस्तार रूप देने का उन्होंने विचार किया महंत जी अलवर नरेश शिवदान सिंह जी से मिले और उन्होंने राजगढ़ के गंगा बाग की बारादरी श्री जगन्नाथ जी महाराज के सप्त दिवसीय मेले हेतु भगवान जगन्नाथ को अर्पण कर दी अब भगवान जगन्नाथ की यह रथ यात्रा बारहदरी भवन में आने लगी अब भगवान जगन्नाथ इस भवन में विराजमान होने लगे अब महाप्रभु को इस मेले और रथ यात्रा का रूप देने हेतु मनोहरी सुंदर गंगा बाग पूरा उपलब्ध हो गया जहां हजारों व्यक्तियों के इस स्थान पर घूमने फिरने दुकान लगने का एक पर्याप्त स्थान था अलवर नरेश सवाई मंगल सिंह जी ने इस बारहदरी के चारों ओर टीन शेड लगवा दिया जो उसे समय तक मौजूद रहा आज वर्तमान में यहां माता श्री गोमती देवी जन सेवा निधि के द्वारा RCC लेंटर का निर्माण परिक्रमा का निर्माणकरा दिया गया है अब यह बड़ा ही सुंदर और सुरक्षित मंदिर बन गया भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा को आज 171 वर्ष पूर्ण हो गए हैं
जगन्नाथ मंदिर के 9 महंतो की वंशावली का वर्णन
आज से लगभग 280 वर्ष पूर्व सन 1753 ई के आसपास महंत श्री राधा चरण जी महाराज अपने इष्ट देव मदन गोपाल जी महाराज को लेकर इस राजगढ़ कस्बे में पधारे और इस एक पीपल के वृक्ष के नीचे उन्होंने मदन गोपाल जी को विराजमान कर कर अपना आसन लगाया कुछ समय तक भगवान की यही व्यवस्था चलती रही तत्पश्चात श्रद्धालु भक्त दीवान शिवबक्श जी ने अपने मकान की पोली भगवान जगन्नाथ जी को के मंदिर हेतु अर्पण कर दी यह पोली आज भगवान जगन्नाथ जी महाराज के मंदिर के रूप में स्थित है इसके पश्चात महंत श्री कृष्णा चरण दास जी महाराज जी ने यहां मूर्ति की प्रतिष्ठा कराकर राधा गोपाल जी महाराज की स्थापना की तदुपरांत महंत केशवदास जी महाराज हुए वे जगन्नाथ पुरी से भगवान जगन्नाथ जी की मूर्ति लेकर आए और उन्होंने मंदिर में भगवान जगन्नाथ की मूर्ति की स्थापना की श्री जगन्नाथ जी महाराज की मूर्ति की स्थापना सन 1851 /52 के लगभग अनुमानित है यह समय महाराज विनय सिंह जी के शासनकाल का अंतिम समय था और महाराज शिव दान सिंह जी के प्रारंभिक काल का समय इस समय वर्तमान में मंदिर में स्थापित प्रथम मूर्ति श्री मदन मोहन जी महाराज द्वितीय स्थापित राधा रानी और साक्षी गोपाल जी महाराज वह तृतीय स्थापित श्री जगन्नाथ जी महाराज तीनों ही देव आज यहां विराजमान है इस महंत परंपरा में महंत गोपाल दास जी महाराज, भक्ति चरण दास महाराज ,महंत हरि कृष्ण शास्त्री और वर्तमान में महंत पूर्ण दास और उनके सुपुत्र पंडित मदन मोहन शास्त्री पंडित रोहित शर्मा इस समय श्री जगन्नाथ जी महाराज राधा रानी साक्षी गोपाल जी और मदन मोहन जी महाराज की सेवा पूजा अर्चना करते आ रहे हैं महंत परिवार की यह परंपरा निरंतर रूप से चली आ रही है भगवान जगन्नाथ की यह रथ यात्रा धर्म परंपरा को सचेत कर सो संस्कृत बनाए हुए हैं यहां प्रातः और साइकिल भक्तों का ताता लगा रहता है सैकड़ो नर नारी भगवान श्री जगन्नाथ जी महाराज के दर्शन कर मन्नतें मांगते हैं इस मंदिर के निर्माण को आज लगभग 297 वर्ष हो गए हैं


