बेरोजगार, दंगाई, आतंकी जैसे ताने और 'भोले के चोर' कांवड़ियों के सामने क्या-क्या मुश्किलें

Jul 22, 2025 - 13:47
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बेरोजगार, दंगाई, आतंकी जैसे ताने और 'भोले के चोर' कांवड़ियों के सामने क्या-क्या मुश्किलें
प्रतिकात्मक छवि

लक्ष्मणगढ़ (अलवर/ कमलेश जैन) श्रावण मास की तपती दोपहर, कंधों पर गंगाजल, पैरों में छाले और आंखों में बस एक ही लक्ष्य—भोलेनाथ का दरबार लेकिन आस्था की इस यात्रा में अब सिर्फ भक्ति नहीं, ट्रोलिंग, सवाल और जिम्मेदारियों की भी कड़ी परीक्षा शामिल हो गई है।
पीयूष शर्मा उम्र 32 वर्ष का गुस्सा इन शब्दों में साफ झलकता है। ये दर्द है उन भक्तों का जो हर साल श्रावण मास में पवित्र गंगाजल लेने हरिद्वार जाते हैं। इनकी श्रद्धा को कुछ भोले की हरकतों ने कठघरे में खड़ा कर दिया।
पीयूष हरिद्वार से 230 किलोमीटर के लगभग दूर अपने गंतव्य की ओर बढ़ रहे हैं। उनके पैरों में मोटे-मोटे छाले हैं, लेकिन मन का दर्द उससे कहीं गहरा है।
 मान लिया कि कांवड़िए आस्था के रास्ते पर भारी कष्ट झेलते हैं. सब सहकर ये यात्रा पूरी करते हैं. लेकिन क्या इसकी आड़ में मारपीट, गुंडागर्दी और ट्रैफिक जाम जैसे वीडियो, जो हर साल वायरल होते हैं, उन्हें नजरअंदाज किया जा सकता है?
इस सवाल पर उपखंड क्षेत्र इलाके से आए राहुल ठाकुर कहते हैं, ऐसी घटनाएं ज़्यादातर उत्तराखंड में होती हैं। वहां कांवड़ियों के लिए अलग रूट्स ठीक से तय नहीं हैं। कई बार गाड़ियों की चपेट में आकर कांवड़ खंडित हो जाती है, और फिर मामला गरम हो जाता है।
हालांकि, कुछ भोले खुले दिल से मानते हैं कि गलती कई बार अपनी भी होती है।तय रूट छोड़कर ट्रैफिक वाले रास्ते पर चलना, जानबूझकर दूसरों को परेशानी में डालना इन वजहों से कई बार विवाद पैदा होते हैं। यानी आस्था की इस यात्रा में व्यवस्था की नहीं, जिम्मेदारी की भी परीक्षा चल रही होती है।
पूरी बातचीत के बाद एक बात साफ हो गई... इन भक्तों के मन में शिकायतें तो हैं, लेकिन शिकस्त नहीं कहीं प्रशासन की ढीली व्यवस्था उन्हें परेशान करती है, तो कहीं अपने ही कुछ साथियों की लापरवाही और सोशल मीडिया पर होने वाली ट्रोलिंग मन को चोट पहुंचाती है।
इसी बीच भोले विजय कुमार ने बताया रास्ते में मिलने वाला अजनबियों का प्यार, सहारा और भोलेनाथ की भक्ति की ताकत उनके थके कदमों को फिर से चलने की हिम्मत देती है। सूरज, रोहित, योगेश, हरि सिंह सीता जैसे हजारों भक्तों के लिए कांवड़ यात्रा सिर्फ एक रस्म नहीं, बल्कि एक विश्वास है जो उन्हें हर साल हरिद्वार की राह पर खींच कर ले जाता है।

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