महंगे खाद-बीजों पर निर्भरता घटेगी और आय बढ़ेगी, केमिकल का सीमित मात्रा में उपयोग कर सकेंगे किसान :प्राकृतिक और जैविक खेती के बाद अब आई परम्परागत खेती
खैरथल (हीरालाल भूरानी)
कृषि विभाग की ओर से प्राकृतिक और जैविक खेती के बाद अब परम्परागत कृषि विकास योजना के तहत परम्परागत खेती की शुरुआत की गई है। यह इन दोनों तरह की खेती से थोड़ी अलग है। प्राकृतिक और जैविक खेती में किसी भी प्रकार के रसायन और केमिकल का उपयोग नहीं होता, जबकि परम्परागत खेती में प्राचीन तकनीकों के साथ सीमित मात्रा में रसायन का उपयोग होता है।
इस योजना का उद्देश्य खेती में परम्परागत ज्ञान के साथ आधुनिक विज्ञान के समन्वय का उपयोग तथा जैविक खेती का टिकाऊ मॉडल विकसित करना है। इसके साथ ही किसानों की महंगे खाद और बीजों पर निर्भरता घटाना, खेती की लागत को कम कर आय को बढ़ाना भी है। कृषि विभाग के संयुक्त निदेशक विजय सिंह ने बताया कि परम्परागत खेती के लिए किसानों को सेमिनार और फील्ड विज़िट आदि के जरिए प्रशिक्षण दिया जाएगा। इस खेती के फायदे भी बताएंगे।
जैविक खेतीः-
जैविक खेती में केमिकल का उपयोग नहीं होता। इसमें आर्गेनिक खाद, बीज और जैविक कीटनाशक का उपयोग होता है। यदि किसान के पास यह उपलब्ध नहीं है, तो इन्हे बाजार से खरीद सकते हैं। इस खेती के लिए सरकार ने अलग से कोई प्रोजेक्ट नहीं निकाला है लेकिन किसानों को जागरूक कर यह खेती करवाई जा रही है। 3 साल तक लगातार जैविक खेती करने के बाद सरकार किसानों को ऑर्गेनिक खेती का सर्टिफिकेट देती है। इसके बाद उत्पादों को ऑर्गेनिक प्रोडक्ट के रूप में देश-विदेश के मार्केट में बेचा जा सकता है। ये उत्पाद महंगे दामों पर बिकते हैं।
प्राकृतिक खेती :-
इस खेती में केमिकल-रसायन का कोई उपयोग नहीं होता है। खाद-बीज और कीटनाशक खुद किसान तैयार करता है। यह गोवंश आधारित खेती है। गोमूत्र, गोबर से जीवामृत सहित अन्य प्रोडक्ट बना कर खेती की जाती है। जिले में 30 कलस्टर बना कर 1500 हैक्टेयर जमीन पर इस खेती का लक्ष्य रखा है। फर्टिलाइजर देने के साथ देसी खाद उपलब्ध कराया जाएगा। खेती की शुरुआत मानसून सीजन से हो गई है।
परम्परागत खेतीः-
केमिकल का सीमित मात्रा में उपयोग कर सकेंगे। यह खेती परम्परागत और आधुनिक कृषि तकनीकों के समन्वय से होगी। इससे सीमित मात्रा में खाद और केमिकल का उपयोग किया जाता है।