शहर का विकास चढ़ रहा राजनीति की भेंट, आज तक मूलभूत सुविधाओं को तरस रहे नागरिक, कोई नहीं ले रहा सुध
जिला बनाया, कार्यालयों के लिए जमीन का आवंटन तक नहीं......... कई प्रोजेक्ट अटके, सरकार नहीं दे रही ध्यान......... दो साल बाद जिला मुख्यालय व नाम परिवर्तन की कर दी घोषणा
खैरथल (हीरालाल भूरानी) खैरथल शहर का विकास राजनीति की भेंट चढ़ रहा है। गत गहलोत सरकार ने खैरथल को जिला मुख्यालय की घोषणा की, लेकिन अगले ही दिन राजनीतिक कारणों के चलते जिले के नाम को खैरथल-तिजारा करना पड़ा। जिस दिन से यह जिला बना उसी दिन से ही विपक्ष की आंखों का किरकिरी बन गया। सरकार बदली नए जिलों के लिए रिव्यू कमेटी बनी तब तय माना गया की खैरथल-तिजारा जिले को अवश्य समाप्त किया जाएगा, लेकिन राजनीतिक दबाव के चलते इस जिले को भजनलाल सरकार ने यथावत रखा। दो साल तक चली उठापटक के बाद जिले की दूसरी सालगिरह वाले दिन सात अगस्त को मुख्यमंत्री ने जिले का नाम परिवर्तन कर दिया। परिणाम स्वरूप आज तक विरोध चल रहा है। दो साल का जश्न मना रही सरकार आज तक जिला मुख्यालय पर मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने में विफल रही है।
किशनगड - कोटपूतली बाइपास ओवर ब्रिज के नहीं हुए टेंडर जारी
गहलोत सरकार के समय में बड़ा प्रोजेक्ट कई वर्षों से अधूरे पड़े। किशनगढ़-कोटपूतली बाइपास पर ओवरब्रिज की राशि मंजूर होने के बाद टेंडर जारी नहीं हुए। अब - ज्ञात हुआ है कि सरकार के वित्त विभाग ने रेल ओवरब्रिज के लिए पुनः 50 करोड़ की राशि स्वीकृति कर दी। जिसका राजस्थान राज्य सड़क विकास निर्माण लिमिटेड (आरएसआरडीसी) के टेंडर छोड़ा जाना है।
ट्रॉमा सेंटर के लिए पांच बीघा जमीन अभी तक नहीं हुई स्वीकृत
उधर, स्वास्थ्य का जिम्मा संभाले खैरथल के सेटेलाइट अस्पताल को ट्रॉमा सेंटर बनाने की दिशा में पांच बीघा जमीन भी अभी तक स्वीकृत नहीं की गई है, वहीं अस्पताल में चिकित्सक स्टाफ की कमी के कारण मरीजों को अन्यत्र भटकना पड़ रहा है। मुख्यालय पर स्वीकृत हुए आईबी कार्यालय, साइबर थाना, वीवी पेट मशीनों के लिए भंडार गृह सहित अन्य विभागों का मामला पेंडिंग ही चल रहा है। बरसों की योजनाएं फाइलों में गुम हो जाने से यहां की जनता अपने आप को ठगा महसूस करने लगी है। लगातार हो रही देरी से इन प्रोजेक्ट्स की लागत भी बढ़ती जा रही है, लेकिन ये योजनाएं सरकारी फाइलों में ही दम तोड़ रही है।
सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा
इन दो वर्षों में जिला सचिवालय सहित अन्य कार्यालयों के लिए जमीन का आवंटन को रोके रखा। हालांकि राज्य सरकार व नगर परिषद चाहती तो नगर परिषद के पास पड़ी सैकड़ों बीघा जमीन पर सभी कार्यालय बन सकते थे। खैरथल में वर्तमान में सरकारी भूमि पर अवैध कब्जे आज भी बने हुए है।
50 करोड़ की पेयजल योजना 10 वर्ष से बंद
इसी प्रकार एनसीआर योजना के तहत लगभग 50 करोड़ की पेयजल योजना भी पिछले दस वर्षों से बंद पड़ी है। जिसके तहत पेयजल आपूर्ति के लिए पूरे शहर में पानी की पाइप लाइन डाली जानी थी, लेकिन आधे शहर में ही लाइन बिछाई गई जो जमीन में ही दफन है। इस योजना में बनाई गई पानी की टंकिया भी आज तक सूखी पड़ी हुई है। वहीं तहसील कार्यालय के पास पानी स्टोरेज के लिए बनाया गया विशाल टैंक भी अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रहा है। इधर लोगों को असुविधा हो रही है।
ओवरब्रिज व रोडवेज डिपो निर्माण ठंडे बस्ते में
इसी प्रकार शहर के मैन रेलवे फाटक संख्या 93 पर भी ओवरब्रिज बनना तय है। जिसका अनेकों बार रेलवे, राजस्व तथा नगर परिषद की सयुंक्त टीम ने मौका निरीक्षण किया, लेकिन फिलहाल मामला ठंडे बस्ते में पड़ा हुआ है। यही नहीं पूर्व में स्वीकृत हुए रोडवेज डिपो की फाइल भी भूमि आवंटन नहीं होने से वह भी ठंडे बस्ते में कैद हो गया। वर्तमान में शहर में तीन स्थानों से बसों का संचालन किया जाता है।