हिंदू संस्कृति की अमूल्य धरोहर : रंगोली
खैरथल (हीरालाल भूरानी)
खैरथल कस्बे में प्रत्येक घरों में दीपावली पर रंगोली बनाई जाती है, बुजर्गो का मानना यह शुभ होती है।
उत्सव व त्यौहारो के समय विशेष कर दीपावली के समय में हर घर को लीपने पोतने का एवं सजाने-संवारने का कार्य किया जाता है। बुजर्ग महिला रेवती जोशी का कहना है कि रंगोली शुभहोती है। आधुनिक समय में दीवारों को सजाने का कार्य पेंटिंग ने ले लिया, वहीं पर घर के बाहर बनी बनाई रंगोली के स्टिकर भी घर के मुख्य दरवाजे पर लगाने की परम्परा चली आ रही है।
आपको बता दे कई स्थानों पर तो रंगोली बनाने के लिए विभिन्न डिजाइन के साधन भी मिलने लगे, जिसमें चावल का आटा भर कर जमीन पर चलाना मात्र होता है और सुंदर आकृतियां उभर आती है। यह एक प्रकार से स्त्रियों द्वारा अपनी रचनात्मकता दिखाने का अवसर भी होता है। ग्रामीण परिवेश अभी भी आधुनिकता से अछूता है। यहां घर के बाहर की दीवारों पर आंगन में मुख्य द्वार के बाहर विभिन्न रंगों की अद्भुत रंगोली देखने को मिल जाएगी। दीपावली पर रंगोली सजाकर स्त्रियां संपूर्ण वातावरण को रंग बिरंगा बना देती है। यह प्रसन्नता की बात है।
आधुनिक और पढ़ी-लिखी स्त्रियों में भी रंगोली अल्पना के प्रति गहरा आकर्षक दिखाई देता है। रंगोली लोग जीवन का एक बहुत अभिन्न अंग है। देश के विभिन्न हिस्सों में रंगोली सजाने का अपना अलग-अलग स्वरूप है और अलग-अलग महत्व भी है।
बताया जाता है कि दक्षिण भारत में स्त्रियां प्रातः काल उठते ही अपने-अपने दरवाजों को विभिन्न रंगों की रंगोली सजाती है। उत्तर भारत में रंगोली की अल्पना या चौक पूरना भी कहा जाता है। त्योहार और उत्सव तो जैसे स्गोली के बिना अधूरे अधुरे ही लगते हैं। प्रतीकोपासना हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग है। यहो कारण है कि प्राचीन काल से अब तक इष्ट प्राप्ति और अनिष्ट परिहार के लिए विविध प्रतीको के पूजने की प्रथा प्रचलित है। आज के पाश्चात्य प्रभाव की पर्याप्त पैठ शहरों में होने के कारण हमारे लोक संस्कृति के प्रतीक शहरी क्षेत्र की अपेक्षा गांव में अधिक लोकप्रिय है। जिन्हें हम अल्पना, चौक पूरना, रंगोली, मांडने मंडाना, कोलम, सखियां आदि नाम से पुकारते हैं। इन प्रतीकों में असीम आस्था, श्रद्धा तथा कल्याण की कामना समाई हुई है। तभी तो पर्व त्योहारो, संस्कृतिक समारोहो, मांगलिक कार्य इत्यादि पर उक्त प्रतीक बनाए जाने की लोक परंपरा और प्रचलन है। मांगलिक अवसरों पर घर में बनाए जाने वाले चित्रांकन प्रायः कुंवारी कन्याओ अथवा स्त्रियों द्वारा किए जाते हैं। जिसमे अल्पना, रंगोली, मांडने अपने-अपने क्षेत्र के अनुसार उकेरे जाते हैं।
प्रारंभ में गाय के गोबर से उस स्थान को लीपा जाता है फिर सींक, सलाई, रुई, बुर्श अथवा उंगली के सहारे अल्पना, रंगोली लोक चित्रकारी आदि बनाने के कार्य प्रारंभ कर दिया जाता है तथा अवसर के अनुरूप लक्ष्मी, कमल का फूल, स्वास्तिक चिड्या, हाथी, शेर, मोर, फूल आदि बड़ी श्रद्धा भक्ति के साथ बनाए जाते हैं। इस तरह स्वास्तिक के चिन्ह को अंकित करना महिलाए शुभमानती है। स्वास्तिक चार भुजाओं का प्रतीक है। ये चार रेखाएं आश्रम, वर्ग, वेद एवं पुरुषार्थ की प्रतीक है।