जैन धर्म के नौवें तीर्थंकर भगवान पुष्प दत का गर्भ कल्याणक महोत्सव मनाया
लक्ष्मणगढ़ (अलवर/कमलेश जैन) भगवान पुष्पदंत जिन्हें सुविधिनाथ के नाम से भी जाना जाता हैं इनका जन्म काकंदी नगरी में हुआ था और उनका प्रतीक चिन्ह (मगरमच्छ) हैं। गर्भ कल्याणक जैन धर्म के पंचकल्याणक (पांच मुख्य कल्याणक) में से पहला है, जो तीर्थंकर की आत्मा के माता के गर्भ में आने (गर्भावतरण) की दिव्य घटना को दर्शाता है। यह एक अत्यंत पवित्र अवसर है जब देवराज इंद्र माता की सेवा करते हैं और देवगण रत्नवृष्टि (रत्नों की वर्षा) करते हैं।
जब तीर्थंकर की आत्मा स्वर्ग से च्युत होकर माता के उदर (गर्भ) में प्रवेश करती है। गर्भ में तीर्थंकर के आने के पूर्व, माता को 16 स्वप्न (दिगंबर परंपरा अनुसार) या 14 स्वप्न (श्वेतांबर परंपरा अनुसार) आते हैं, जो भावी तीर्थंकर की महानता के प्रतीक हैं।गर्भ में ही तीर्थंकर का मन, श्रुत और अवधि ज्ञान से युक्त होता है, जिससे माता को कोई कष्ट नहीं होता और उनका उदर दिव्य तेजस्वी हो जाता है।
इंद्र की आज्ञा से कुबेर द्वारा माता के घर में रत्नों की वर्षा की जाती है। गर्भकल्याणक आत्मा की शुद्धि और महानता के स्वागत का पर्व है, कस्बे के आदिनाथ दिगंबर जैन मंदिर में नवे तीर्थंकर भगवान पुष्प दत का गर्भकल्याणक महोत्सव भक्ति भाव से मनाया गया। आज मंगलवार को प्रातः लोकेश जैन धीरज जैन ने अभिषेक शांति धारा के बाद अष्ट द्रव्य से पूजा अर्चना की । भगवान को अर्घ चढ़ाकर सुख समृद्धि खुशहाली की कामना की गई। इस अवसर पर अनेक जैन धर्म के अनुयाई महिला पुरुष मौजूद रहे।
गर्भ कल्याणक के दौरान विशेष पूजा और अर्चना की गई।जो तीर्थंकर के पवित्र संस्कारों और जन्म के पूर्व के दिव्य जीवन को सम्मान देता है।