इतिहास में पहली बार शास्त्रीय सामयिक का आयोजन
तखतगढ़ (बरकत खान) राजस्थान के इतिहास में पहली बार नगर में शास्त्रीय सामयिक का आयोजन किया गया ।जैन श्वेतांबर मूर्तिपूजक संघ के तत्वावधान में जैनाचार्य रश्मिरत्नसूरीश्वर महाराज की निश्रा में आयोजन हुआ।तखतगढ़ में 50 वर्ष पूर्व दीक्षादानेश्वरी आचार्य गुणरत्नसूरिश्वर म.सा ने चातुर्मास किया और जागृति का शंखनाद फूका । प्रेमचंद ने दीक्षा लेकर मुनि पुण्यरत्न विजय व जयंतीलाल मुनि यशोरत्न विजय बने व 13 साल के रमेश दीक्षा लेकर मुनि रश्मिरत्न विजय बने। 50 साल के बाद तीनो तखतगढ़ नंदन जैनाचार्य बने हैं और जिनशासन का ध्वजापताका लहरा रहे हैं । जैनाचार्य श्री रश्मिरत्नसूरीश्वरजी म.सा ने बताया कि जिनशासन की आन, बान और शान बढ़ाना हर एक शासन समर्पित आत्मा का कर्तव्य है । शुधाचार की प्रतिष्ठा बिना आत्मकल्याण शक्य नहीं है । इंसान खुद को भूल चुका है। सामायिक यानी सम भाव में रहकर खुद को पहचानने की क्रिया । जिसको आत्मज्ञान हो गया , उसको इधर किसी ज्ञान की जरूरत नहीं है ।
सामायिक दौरान विश्व शांति हेतु पांच मुद्राओं के साथ नवकार महामंत्र का जाप भी करवाया गया । 498शिष्यों की गुरुमाता बेन महाराज प्रवर्तिणी साध्वी श्री पुण्यरेखाश्रीजी की दीक्षा की स्वर्ण जयंती भी मनाई गई । अतिशीघ्र 500 शिष्य का रिकॉर्ड होगा । कल पादरली गांव में वतन के फरिश्ते श्री गुणरत्नसूरीश्वर की गुरु मूर्ति की प्रतिष्ठा भव्य रूप से सम्पन्न होगी ।जैनाचार्य रश्मिरत्नसूरीश्वर महाराज ने बताया कि जैन समाज में संपूर्ण भारत में राधनपुर नंबर वन है जहां900 दीक्षाऐ हुई है तो राजस्थान में नंबर वन पर तखतगढ़ है। जहां 180 दीक्षाएं हुई है । नंबर 2 पर है पिंडवाड़ा जहां 130 दीक्षाऐ हुई है। नंबर 3 पर है सिरोड़ी जहां 54दीक्षाऐ हो चुकी है । जिन्होंने अपनी संतान को दीक्षा दी हो वे रत्नकुक्षी माता-पिता कहलाते हैं । तखतगढ़ में उपस्थित ऐसे माता-पिता का तिलक हार से बहुमान किया गया । चरित्र बाल्दिया आशा बाल्दिया आदि ने बहुमान किया ।