बिगड़ते मौसम की मार: किसानों पर बढ़ता संकट
लक्ष्मणगढ़ (अलवर/कमलेश जैन) उपखंड क्षेत्र में बदलते मौसम का असर अब साफ तौर पर खेत-खलिहानों में दिखने लगा है। रबी फसलों की कटाई का समय है, लेकिन इस बार मौसम की अनिश्चितता ने किसानों की चिंता कई गुना बढ़ा दी है। क्षेत्र में कहीं अचानक बारिश, कहीं ओलावृष्टि और कहीं तेज गर्मी—इन तीनों परिस्थितियों ने किसानों की महीनों की मेहनत पर पानी फेरने का खतरा पैदा कर दिया है।
पिछले दिनों एवं आज मंगलवार को हुई रुक-रुक कर असमय बारिश और ओलावृष्टि ने रबी फसलों पर सीधा प्रहार किया है। गेहूं,की फसलें इस समय पूरी तरह पक चुकी हैं। ऐसे में बारिश होने से फसल खेतों में ही भीग रही है, जिससे दाने काले पड़ने और अंकुरित होने का खतरा बढ़ गया है। कई इलाकों में खेतों में पानी भर जाने से कटाई कार्य रुक गया है। इससे न केवल उत्पादन पर असर पड़ेगा, बल्कि किसानों की लागत भी बढ़ेगी क्योंकि उन्हें दोबारा सुखाने और भंडारण की व्यवस्था करनी पड़ेगी।
चल रही हवाएं गेहूं की फसल के लिए सबसे बड़ा खतरा बन रही हैं। बालियां झुककर जमीन पर गिर रही हैं,इससे फसल की गुणवत्ता खराब हो जाती है और कटाई में भी ज्यादा मेहनत लगती है। गिरी हुई फसल को मशीन से काटना मुश्किल होता है, जिससे किसानों की लागत और समय दोनों बढ़ जाते हैं। साथ ही मंडियों में ऐसी फसल को कम दाम मिलता है, जिससे किसानों को दोहरा नुकसान झेलना पड़ता है।
किसानों को बीमा और मुआवजे की चुनौती
सरकार द्वारा चलाई जा रही फसल बीमा योजनाएं किसानों के लिए राहत का जरिया हो सकती हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर कई समस्याएं सामने आती हैं। सर्वे में देरी, कागजी प्रक्रिया की जटिलता और मुआवजे के भुगतान में लंबा समय किसानों की परेशानी बढ़ा देता है।
कई किसान समय पर बीमा क्लेम नहीं कर पाते, जबकि जिन्हें मिलता भी है, उन्हें पूरी भरपाई नहीं हो पाती। ऐसे में किसानों की मांग है कि नुकसान का आकलन जल्दी हो और मुआवजा सीधे और समय पर दिया जाए।
एक तरफ प्राकृतिक आपदाएं हैं, तो दूसरी तरफ आर्थिक दबाव। अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए—जैसे तेज राहत, बेहतर बीमा व्यवस्था और आधुनिक कृषि तकनीक—तो इसका असर न केवल किसानों की आय पर बल्कि खाद्य सुरक्षा पर भी पड़ सकता है। इधर आज हुई रुक-रुक कर हल्की बारिश से वाहन चालकों एवं स्कूली बच्चों को भी परेशानी का सामना करना पड़ा।


