मानसरोवर झील प्रकरण: NGT में रिपोर्ट पेश, 64 बीघा जमीन के हेरफेर और सीवरेज प्रदूषण पर सख्त रुख; गंभीर अनियमितताएं उजागर
भीलवाड़ा (बद्रीलाल माली) मानसरोवर झील संरक्षण को लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT), भोपाल में चल रहे वाद (ओ.ए. नं. 15/2026) में संयुक्त समिति ने अपनी चौंकाने वाली रिपोर्ट पेश की है। पब्लिक पावर एंड अवेयरनेस सोसायटी की याचिका और मंगलपुरा निवासी गोटू सिंह की शिकायत पर हुई सुनवाई में झील के अस्तित्व और पर्यावरणीय नियमों की गंभीर अनदेखी उजागर हुई है।
रिपोर्ट में उजागर हुई मुख्य अनियमितताएं:
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झील क्षेत्र में भारी कटौती: समिति की रिपोर्ट के अनुसार, मानसरोवर झील का मूल क्षेत्रफल 116 बीघा था, जिसे कागजों में घटाकर मात्र 52 बीघा दर्शाया गया। शेष 64 बीघा बेशकीमती भूमि को नगर विकास न्यास (UIT) द्वारा आवासीय व अन्य कार्यों के लिए आवंटित कर दिया गया। एनजीटी ने इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए पूछा है कि झील की प्रकृति बदलने का अधिकार किस प्राधिकरण ने और कब दिया?
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सीवरेज का सीधा प्रवाह: झील में बिना उपचारित (Untreated) गंदा पानी गिरने की पुष्टि हुई है। न्यायाधिकरण ने राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (RSPCB) को दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई करने और पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति वसूलने के निर्देश दिए हैं।
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जलकुंभी की समस्या: झील में 'पिस्टिया' (जलकुंभी) की समस्या के समाधान हेतु विशेषज्ञों की राय पर यांत्रिक सफाई (Mechanical Removal) को मंजूरी दी गई है। यह कार्य अगले तीन वर्षों तक निरंतर निगरानी में रहेगा।
न्यायाधिकरण ने संबंधित विभागों को दो सप्ताह के भीतर विस्तृत 'एक्शन टेकन रिपोर्ट' प्रस्तुत करने का आदेश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 24 जुलाई 2026 को तय की गई है।
शिकायतकर्ता का पक्ष: मंगलपुरा निवासी गोटू सिंह ने कहा कि यह लड़ाई सार्वजनिक संपत्ति और पर्यावरण को बचाने की है। प्रशासन को चाहिए कि झील को उसके मूल स्वरूप (116 बीघा) में पुनर्स्थापित करे और दोषियों पर सख्त कार्रवाई करे।


