उम्र ढल गई, जरूरत नहीं: भीलवाड़ा में बुजुर्गों ने कहा—अब तो बस एक साथी चाहिए

Apr 19, 2026 - 19:52
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उम्र ढल गई, जरूरत नहीं: भीलवाड़ा में बुजुर्गों ने कहा—अब तो बस एक साथी चाहिए

भीलवाड़ा, (बृजेश शर्मा) अक्षय तृतीया के मौके पर शहर में आयोजित ‘बुजुर्ग विवाह परिचय सम्मेलन’ ने समाज के सामने एक संवेदनशील सच्चाई रख दी—उम्र भले ही ढल जाए, लेकिन साथ की जरूरत कभी खत्म नहीं होती। देशभर से आए 50 से 80 वर्ष तक के करीब 105 बुजुर्गों ने इस मंच पर अपने अकेलेपन को साझा किया और जीवन के इस पड़ाव पर एक हमसफर की तलाश में खुले दिल से आगे बढ़े।
सम्मेलन में कई मार्मिक दृश्य देखने को मिले। कोई अपनी विधवा बेटी के लिए रिश्ता ढूंढने आया, तो कोई खुद के लिए जीवनसाथी की तलाश में पहुंचा। एक 80 वर्षीय मां अपनी 55 साल की बेटी के साथ सम्मेलन में पहुंचीं। उन्होंने बताया कि दामाद के निधन के बाद बेटी अकेली हो गई है, ऐसे में उसके जीवन में फिर से खुशियां लाने के लिए वे यहां आई हैं।
अहमदाबाद से आई गीता देवी ने अपनी जिंदगी की कहानी साझा करते हुए बताया कि शादी के चार साल बाद ही एक दुर्घटना में उनके पति का निधन हो गया था। पिछले करीब 28 वर्षों से उन्होंने अकेले ही बच्चों की परवरिश और उनकी शादियां करवाईं। अब जब सभी जिम्मेदारियां पूरी हो चुकी हैं, तो अकेलापन महसूस होने लगा है। उन्होंने कहा कि जीवन के इस मोड़ पर एक ऐसा साथी चाहिए, जिससे मन की बात की जा सके और जीवन को फिर से सहजता से जिया जा सके।
चंडीगढ़ से आए पंजाब नेशनल बैंक के सेवानिवृत्त मैनेजर डॉ. दिलबाग राय भाटिया ने बताया कि उनकी पत्नी का निधन उनके रिटायरमेंट से महज 10 दिन पहले हो गया था। पिछले 12 वर्षों से वे अकेले जीवन बिता रहे हैं। उन्होंने कहा कि पहले लगा था कि अब किसी साथी की जरूरत नहीं, लेकिन समय के साथ यह एहसास हुआ कि सुख-दुख साझा करने और बातचीत के लिए एक हमसफर होना जरूरी है। सम्मेलन में उन्होंने एक महिला से बातचीत भी की है और आगे बात बढ़ने की संभावना जताई।

आयोजक अशोक जैन ने बताया कि सम्मेलन में प्रतिभागियों के बीच अच्छा संवाद हुआ। कई लोगों ने एक-दूसरे के फोन नंबर साझा किए हैं और उम्मीद जताई जा रही है कि आने वाले दिनों में 4 से 5 जोड़े विवाह के बंधन में बंध सकते हैं। हालांकि कई मामलों में परिवार की सहमति भी जरूरी होगी।
इस आयोजन का संचालन अहमदाबाद की ‘अनुबंध फाउंडेशन’ द्वारा किया गया। संस्था के अध्यक्ष नंदूभाई पटेल ने बताया कि इस पहल की शुरुआत 2001 के गुजरात भूकंप के बाद हुई थी, जब बड़ी संख्या में लोगों ने अपने जीवनसाथी खो दिए थे। तब से अब तक 94 सम्मेलनों में करीब 16 हजार बुजुर्ग भाग ले चुके हैं और 224 जोड़े विवाह कर चुके हैं। भीलवाड़ा में यह संस्था का 95वां सम्मेलन रहा।
उन्होंने कहा कि समाज अक्सर बुजुर्गों की भौतिक जरूरतों का ध्यान रखता है, लेकिन उनके भावनात्मक अकेलेपन को नजरअंदाज कर देता है। यह मंच उसी खालीपन को भरने का प्रयास है। उनका मानना है कि खुश रहने और जीवनसाथी चुनने का अधिकार किसी भी उम्र में खत्म नहीं होता।
यह सम्मेलन एक संदेश दे गया—जिंदगी के किसी भी पड़ाव पर इंसान को एक साथी की जरूरत होती है, और इसे स्वीकार करना ही जीवन को बेहतर बनाने की दिशा में पहला कदम है।

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