अलवर में रामलीला का आठवाँ दिन: सीता हरण और जटायु वध के प्रसंग देख भावुक हुए दर्शक, राम-सुग्रीव मित्रता का हुआ मंचन
अलवर (अनिल कुमार गुप्ता)
अलवर के प्रसिद्ध श्री राजर्षि अभय समाज के रंगमंच पर चल रही 111वें वर्ष की ऐतिहासिक रामलीला के आठवें दिन मंचन ने दर्शकों को भावविभोर कर दिया। आज के मंचन में रावण द्वारा सीता हरण से लेकर भगवान राम और सुग्रीव की मित्रता तक के विभिन्न मार्मिक और प्रेरणादायक प्रसंगों का सजीव चित्रण किया गया।
भावुक कर देने वाला जटायु उद्धार प्रसंग:
लीला की शुरुआत पंचवटी में सूर्पणखा की नाक-कान काटने की घटना से हुई, जिसके परिणामस्वरूप रावण ने अपनी मायावी चाल से माता सीता का हरण किया। सीताजी के वियोग में भगवान राम की व्याकुलता के दृश्य ने दर्शकों की आँखें नम कर दीं। इसके बाद, माता सीता की रक्षा करते हुए रावण द्वारा घायल किए गए गिद्धराज जटायु के उद्धार की लीला ने सभी को झकझोर दिया। श्रीराम ने एक पुत्र का कर्तव्य निभाते हुए जटायु का अंतिम संस्कार किया, जिससे समाज को नारी रक्षा के लिए हरसंभव प्रयास करने का एक बड़ा संदेश मिला।
शबरी मिलन और निर्मल भक्ति का संदेश:
माता सीता की खोज में भटकते राम-लक्ष्मण जब शबरी मैया की कुटिया पहुँचे, तो वहाँ शबरी मिलन का अलौकिक प्रसंग मंचित किया गया। भगवान श्रीराम ने शबरी को अपनी भक्ति प्रदान कर मोक्ष दिया। इस प्रसंग के माध्यम से दर्शक भगवान की शरण में निर्मल भक्ति के भाव से ओत-प्रोत हो उठे।
अग्नि को साक्षी मानकर हुई राम-सुग्रीव मित्रता:
इसके पश्चात, ऋष्यमूक पर्वत पर प्रभु राम की भेंट उनके अनन्य भक्त हनुमान जी से हुई। हनुमान जी की मध्यस्थता से अग्नि को साक्षी मानकर राम और सुग्रीव की मित्रता कराई गई। इस प्रसंग के जरिए यह दर्शाया गया कि सच्ची मित्रता में परस्पर सहयोग और अटूट विश्वास का होना कितना आवश्यक है।
वन्यजीवों और वंचितों के प्रति प्रेम का संदेश:
संस्था द्वारा आयोजित इस 111वीं रामलीला के माध्यम से यह संदेश जन-जन तक पहुँचाया जा रहा है कि भगवान श्रीराम का जीवन केवल मर्यादा का ही नहीं, बल्कि शोषितों, वंचितों, आदिवासियों और यहाँ तक कि वन्यजीवों के प्रति अगाध प्रेम और करुणा का प्रतीक है।

