बदलाव पुरानी जीवनशैली व सादगी, स्वच्छता खो रहे, चाय से लेकर दावतों में बढ़ने लगा मिट्टी के बर्तनों का क्रेज
खैरथल (हीरालाल भूरानी) आजकल की तेज रफ्तार जिंदगी ने हमें आधुनिक सुविधाओं और पैक्ड उत्पादों की ओर आकर्षित किया है, लेकिन इसके साथ ही हम अपनी पुरानी जीवनशैली की सादगी, स्वच्छता और संतुलन को खोते जा रहे हैं।
प्लास्टिक, प्रोसेस्ड भोजन और रासायनिक उत्पादों के बढ़ते उपयोग ने हमारे स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाला है। वहीं, गांवों में आज भी सादगी से भरी जीवनशैली जीवित है। जहां पाचन संबंधी समस्याएं, मानसिक तनाव, मोटापा और गंभीर बीमारियां कम देखने को मिलती है। गांवों में बुजुर्ग महिलाएं आज भी मिट्टी के बर्तनों में खाना पकाती है, ताजी घरेलू सामग्री से सादा भोजन बनाती है और स्वच्छता का ध्यान रखती हैं। मिट्टी के बर्तन में पकाया गया भोजन न केवल स्वादिष्ट होता है, बल्कि इसमें प्राकृतिक मिनरल्स भी होते हैं, जो पाचन शक्ति को बेहतर बनाते हैं।
आयुर्वेद में भी इसे स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माना गया है। गांवों में लोग अपनी या पड़ोसी की फसल से ताजी सब्जियां, देशी मसाले, गाय के दूध से बने उत्पादों का उपयोग करते हैं, जिससे भोजन अधिक पोष्टिक और स्वस्थ होता है। आज के सर्दी के मौसम में गांवों में चूल्हे पर पकाई गई बाजरे की रोटी, देसी घी, दही और छाछ जैसे पारंपरिक भोजन न केवल स्वाद में समृद्ध होते हैं, बल्कि शरीर को अनेक बीमारियों से भी बचाते है। यदि शहरवाले भी इस सादगी को अपनाएं तो वे भी अपनी जीवनशैली में सुधार और स्वास्थ्य में बढ़ोत्तरी देख सकते हैं।