अधिवक्ताओं से ही न्याय एवं अधिकार का मिलना सम्भव - मनोज मील

Dec 2, 2025 - 15:27
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अधिवक्ताओं से ही न्याय एवं अधिकार का मिलना सम्भव - मनोज मील

झुंझुनूं  (सुमेरसिंह राव) देश के संविधान की रोशनी में न्यायप्रिय शासन व्यवस्था की चाहत रखने वाले हरेक भारतीय के लिए और विशेष रूप से अधिवक्ताओं के लिए आज अपने संवैधानिक दायित्व एवं अधिकारों पर मनन करने का दिवस है। देश के प्रथम राष्ट्रपति और प्रख्यात एडवोकेट डॉ राजेंद्र प्रसाद के जन्मदिवस के मौके पर देशभर में अधिवक्ता दिवस मनाया जाता है।
3 दिसंबर 1884 को जन्में डॉ राजेंद्र प्रसाद ने चंपारण सत्याग्रह, नमक सत्याग्रह, भारत छोड़ों आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई और कई बार जेल गए। बहुत कम लोगों को मालूम है कि लाल बहादुर शास्त्री के ‘जय जवान-जय किसान’ के नारे से एवं डॉ एम.एस. स्वामीनाथन की हरित क्रांति से बहुत पहले डॉ राजेन्द्र प्रसाद देश की अंतरिम सरकार में खाद्य एवं कृषि मंत्री रहते हुए ‘अधिक अन्न उगाओ’ का नारा दे चुके थे।
कई बार यह सवाल पूछा जाता है कि इस देश में अधिवक्ताओं का इतना सम्मान क्यों है? इसका बड़ा ही सरल सा जवाब है कि भारत की स्वतंत्रता में अधिवक्ताओं का विशेष योगदान रहा है। जितने भी प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी हुए, उनमें से अधिकांश अधिवक्ता ही थे। ये वही अधिवक्ता थे, जिन्होंने असंख्य स्वतंत्रता सेनानियों की नि:शुल्क पैरवी कर उन्हें तत्कालीन अंग्रेज सरकार के क्रूर फांसी के फंदे से भी बचाया। अब क्योंकि अंग्रेज सरकार का शासन तो समाप्त हो गया है, लेकिन फिर भी शोषण की प्रवृत्ति अभी भी अवचेतन मन में बची हुई है। इसी कड़ी में उपभोक्ताओं के साथ अनुचित व्यापार-कार्य व्यवहार के 'फंदे' से बचाने में अधिवक्तागण आज भी अपना अहम योगदान दे रहे हैं। यही वजह है कि देश-प्रदेश में उपभोक्ता जागरूकता लगातार बढ़ रही है। अकेले झुंझुनूं जिले में गत 2 वर्ष में ढ़ाई हजार से अधिक प्रकरणों का निस्तारण किया गया है।उपभोक्ताओं को त्वरित न्याय उपलब्ध करवाना तभी सम्भव हो पाया है, जब अधिवक्ताओं ने सकारात्मक रूप से उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की खूबसूरती को धरातल पर लागू करने में आगे बढ़ कर सहयोग किया है। 
दरअसल उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम अपने आप में ऐसा संपूर्ण अधिनियम है जिसके दायरे में हर वो व्यक्ति शामिल है, जिसने वस्तु या सेवा क्रय पर रसीद ली है। इस कानूनी अधिकार के असली नायक/सेनापति का दायित्व अधिवक्ता ही निभाते है,तभी उपभोक्ताओं को न्याय मिल पाना सम्भव हुआ है। साथ ही अधिवक्तागण समय-समय पर उपभोक्ता हितों की पैरवी कर सही मायने में मजबूत लोकतंत्र का अहसास भी करवाते हैं। वर्तमान समय की कसौटी में मजलूमों, पीड़ित-शोषित को न्याय दिलाने में अधिवक्ता को न्याय व्यवस्था का मेरुदण्ड कहा जाये तो कोई अतिश्योक्ति नहीं है।

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