दावों की खुली पोल: रैणी के पाड़ा पंचायत शिविर में जनता 'नदारद', अधिकारी-कर्मचारी रहे मौजूद
सरकारी धन का अपव्यय: टेंट, पानी और नाश्ते पर उड़ाए पैसे, पर धरातल पर काम शून्य
रैणी (अलवर) सरकार द्वारा ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को राहत देने और जन कल्याणकारी योजनाओं के प्रचार-प्रसार के लिए चलाए जा रहे 'ग्रामीण सेवा शिविर' धरातल पर महज एक औपचारिक खानापूर्ति बनकर रह गए हैं। सोमवार (06 जुलाई 2026) को उपखण्ड क्षेत्र रैणी की पाड़ा पंचायत मुख्यालय पर आयोजित ग्रामीण सेवा शिविर में इसकी बानगी साफ देखने को मिली। शिविर में आम जनता तो कहीं दूर-दूर तक नजर नहीं आई, अलबत्ता पांडाल में सिर्फ और सिर्फ विभागों के अधिकारी और कर्मचारी ही खाली कुर्सियों के सहारे समय काटते दिखे।
सुबह 9 से शाम 6 बजे तक सिर्फ हाजिरी की मजबूरी
शिविर में पहुंचे संबंधित जिम्मेदार उच्चाधिकारी और विभिन्न विभागों के कर्मचारी सरकार के आदेशानुसार सुबह 9 बजे से ही अपनी टेबल सजाकर बैठ गए थे। लेकिन पूरा दिन बीत जाने के बाद भी शिविर परिसर में सन्नाटा पसरा रहा। ग्रामीणों की अनुपस्थिति के चलते अधिकारी और कर्मचारी आपस में ही गपशप कर समय बिताते नजर आए।
टेंट-नाश्ते पर भारी खर्च, पर ढाक के तीन पात
स्थानीय प्रबुद्ध नागरिकों ने इस अव्यवस्था पर गहरा रोष जताया है। ग्रामीणों का कहना है कि सरकार इन शिविरों के नाम पर टेंट, छाया, पानी, वीआईपी नाश्ते और अन्य व्यवस्थाओं पर पानी की तरह पैसा बहा रही है। यह सीधे तौर पर जनता की गाढ़ी कमाई के पैसे का दुरुपयोग है। अगर शिविर में जनता ही नहीं आ रही है और धरातल स्तर पर किसी का काम ही नहीं हो रहा, तो ऐसे आयोजनों का क्या औचित्य?
सजक नागरिक की आवाज: "कर्मचारी तो आदेश के मारे सुबह से शाम तक बैठ जाते हैं, लेकिन बिना जनता के इस पूरे तामझाम का कोई मतलब नहीं रह जाता। प्रशासन को पहले ग्रामीणों को जागरूक करना चाहिए था, न कि सिर्फ कागजी खानापूर्ति के लिए बजट ठिकाने लगाना चाहिए।"
प्रचार-प्रसार के दावों की खुली पोल
शिविर की यह बदहाली साफ बयां करती है कि स्थानीय प्रशासन द्वारा शिविर के आयोजन को लेकर क्षेत्र में कोई ठोस प्रचार-प्रसार नहीं किया गया। सूचना के अभाव में ग्रामीण अपने रोजमर्रा के काम और खेती-बाड़ी छोड़कर शिविर तक नहीं पहुंचे। अब देखना यह है कि क्या उच्चाधिकारी इस फ्लॉप शो का संज्ञान लेकर संबंधित लापरवाह अधिकारियों के खिलाफ कोई कार्रवाई करते हैं या फिर आगे के शिविर भी इसी तरह 'जनता विहीन' ही आयोजित होते रहेंगे।


