14 टांके, 5 घंटे का खौफ और प्रशासनिक लीपापोती: भानू तो लौट आया, पर सोए हुए तंत्र की नींद कब टूटेगी?

Sep 1, 2026 - 11:33
Sep 1, 2026 - 11:41
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14 टांके, 5 घंटे का खौफ और प्रशासनिक लीपापोती: भानू तो लौट आया, पर सोए हुए तंत्र की नींद कब टूटेगी?
  • कागजी हिदायतें और धरातल पर शून्य: कनवाड़ा के गोलू से लेकर बुटोली के भानू तक... हादसों से भी सबक नहीं ले रहे जिम्मेदार!
  • 'मौत के मुहाने' पर अब भी खड़े हैं दर्जनों मासूम: बुटोली में हादसा टला पर सवाल बरकरार, क्या हर बार चमत्कार के भरोसे रहेगा प्रशासन?

बड़ौदामेव (अलवर)

कटी पतंग के पीछे दौड़ते 8 साल के मासूम भानू का 60 फीट गहरे अंधेरे में 5 घंटे तक जिंदगी और मौत से लड़ना किसी हादसे की कहानी मात्र नहीं है, बल्कि यह जिला प्रशासन और संबंधित विभागों की आपराधिक बेपरवाही का जिंदा दस्तावेज है। रात 11 बजे जब भानू को बोरवेल से बाहर निकाला गया, तो पूरा गांव राहत की सांस ले रहा था, लेकिन बच्चे के सिर पर लगे 14 टांके और उसके चेहरे का खौफ बार-बार एक ही सवाल पूछ रहा है—"आखिर इस खौफनाक मंजर का जिम्मेदार कौन है?"

हादसे के बाद ही क्यों जागता है अमला?

बुटोली गांव में सोमवार शाम 5:45 बजे जब भानू बोरवेल में गिरा, तो हमेशा की तरह पूरा प्रशासनिक अमला—विधायक, एसडीएम, डीएसपी, तहसीलदार से लेकर पुलिस बल तक मौके पर पहुंच गया। तीन-तीन जेसीबी गरजने लगीं, ऑक्सीजन पाइप डाले गए और 5 घंटे के भारी दबाव के बाद बच्चे को रस्सी के सहारे सुरक्षित खींच लिया गया। रेस्क्यू के तुरंत बाद उस बोरवेल को मिट्टी से भर भी दिया गया। लेकिन सवाल यह है कि जो मुस्तैदी और संसाधन हादसा होने के बाद दिखाए गए, क्या वही सतर्कता जिले में खुले पड़े दर्जनों अन्य बोरवेलों को बंद कराने में नहीं दिखाई जा सकती थी?

कागजी आदेशों की बलि चढ़ती सुरक्षा

राज्य सरकार और उच्च न्यायालय के स्पष्ट दिशा-निर्देश हैं कि खेतों या सार्वजनिक स्थानों पर खुले पड़े बोरवेलों को तत्काल प्रभाव से बंद कराया जाए और लापरवाही बरतने वाले जमीन मालिकों पर सख्त कार्रवाई की जाए। इसके बावजूद अलवर जिले के ग्रामीण अंचलों में दर्जनों बोरवेल आज भी बिना किसी सुरक्षा घेरे के खुले पड़े हैं। करीब दो साल पहले लक्ष्मणगढ़ के कनवाड़ा में 5 साल का गोलू भी 100 फीट गहरे बोरवेल में गिरा था। तब भी बड़े-बड़े दावे किए गए थे, लेकिन जांच और कार्रवाई के नाम पर केवल 'खानापूर्ति' हुई। नतीजा यह रहा कि दो साल बाद बुटोली में एक और मासूम जिंदगी की जंग लड़ने पर मजबूर हुआ।

जांबाज ग्रामीणों ने दिखाई हिम्मत, तंत्र की योजनाएं फेल

रेस्क्यू के दौरान प्रशासन की जेसीबी से समानांतर खुदाई की योजना पाइप धंसने के खतरे के कारण अधर में लटक गई। यदि गांव के जांबाज इस्सार और इकबाल खान अपनी जान जोखिम में डालकर आगे न आते और SDRF के जवानों के साथ कंधे से कंधा न मिलाते, तो इस ऑपरेशन का परिणाम कुछ और भी हो सकता था। उल्टे लटककर बोरवेल में उतरने का साहस दिखाने वाले इस्सार जैसे ग्रामीणों ने साबित कर दिया कि तंत्र के पास आपात स्थिति से निपटने के लिए केवल कागजी योजनाएं हैं, धरातल पर काम केवल हिम्मत और सूझबूझ से ही हुआ।

अब लीपापोती नहीं, जवाबदेही तय हो

हर हादसे के बाद एक-दो दिन बैठकों का दौर चलता है, दिशा-निर्देशों की प्रतियां बांटी जाती हैं और फिर मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। बुटोली के बोरवेल को मिट्टी से भर देना इस समस्या का अंत नहीं है। जब तक खुले बोरवेल छोड़ने वाले खेत मालिकों और निरीक्षण में लापरवाही बरतने वाले निचले प्रशासनिक अमले पर कानूनी शिकंजा नहीं कसा जाएगा, तब तक जिले के मासूम यूं ही 'मौत के मुहाने' पर खेलते रहेंगे। प्रशासन को अब तय करना होगा कि वह हादसों का इंतजार करेगा या समय रहते इन खुले कुओं को हमेशा के लिए दफन करेगा।

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