'इस्सुरु की अमर गाथा': 1942 में बनाई खुद की 'स्वराज सरकार', अंग्रेजों को टैक्स देने से इंकार कर दी थी सीधी चुनौती
कर्नाटक / कमलेश जैन
भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई वीरता और अमर बलिदानों की प्रेरणादायक कहानियों से भरी पड़ी है। इन्हीं में से एक अभूतपूर्व अध्याय है कर्नाटक के शिवमोग्गा जिले में स्थित एसुरु (इस्सुरु) गांव, जिसने 1947 में मिली देश की आजादी से लगभग 5 साल पहले ही यानी 29 सितंबर 1942 को खुद को ब्रिटिश हुकूमत से आजाद घोषित कर तिरंगा फहरा दिया था।
गांधीजी के 'भारत छोड़ो आंदोलन' से जगी थी अलख 1942 में जब महात्मा गांधी ने 'भारत छोड़ो आंदोलन' का आह्वान किया, तो एसुरु गांव के निवासियों में देशभक्ति का ज्वार उठ खड़ा हुआ। गांव वालों ने अंग्रेजी हुकूमत को किसी भी प्रकार का टैक्स (कर) देने से साफ इनकार कर दिया और गांव के मुख्य प्रवेश द्वार पर 'स्वराज सरकार' का बोर्ड लगाकर अपनी खुद की प्रति-सरकार (प्रांतीय सरकार) का गठन कर लिया।
सशस्त्र अंग्रेजी सेना से भिड़ गए थे ग्रामीण गांव में भारतीय तिरंगा फहराना केवल एक प्रतीकात्मक विरोध नहीं था, बल्कि यह औपनिवेशिक शासन को सीधी चुनौती थी। जब अंग्रेज अधिकारियों और सेना ने गांव पर पुन: कब्जा करने के लिए धावा बोला, तो ग्रामीणों और ब्रिटिश पुलिस के बीच हिंसक झड़प हुई। इस संघर्ष में एक ब्रिटिश रेवेन्यू ऑफिसर मारा गया।
5 वीरों को मिली फांसी, सैकड़ों जेल भेजे गए विद्रोह को कुचलने के लिए ब्रिटिश सरकार ने बेहद दमनकारी रुख अपनाया। 8 मार्च 1943 को इस आंदोलन से जुड़े गांव के 5 युवा स्वतंत्रता सेनानियों को फांसी की सजा दे दी गई, जबकि सैकड़ों ग्रामीणों को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया।
ऐतिहासिक महत्व और 'जीके' फैक्ट्स:
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स्थान: एसुरु (इस्सुरु) गांव, जिला शिवमोग्गा, कर्नाटक।
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क्रांति का वर्ष: 29 सितंबर 1942 (भारत छोड़ो आंदोलन के समय)।
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स्वराज का संकल्प: अंग्रेजों को टैक्स देने से इनकार और 'स्वराज सरकार' का बोर्ड स्थापित करना।
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अमर बलिदान: 8 मार्च 1943 को 5 स्वतंत्रता सेनानियों को फांसी दी गई।
आज भी एसुरु गांव में शहीदों की स्मृति में एक भव्य स्मारक बना हुआ है। एसुरु की यह गाथा इस बात का जीवंत प्रमाण है कि भारत की आजादी की लड़ाई केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं थी, बल्कि देश के दूर-दराज के गांवों ने भी स्वतंत्रता के यज्ञ में अपने प्राणों की आहुति दी थी।

