देवशयनी एकादशी 6 जुलाई को
लक्ष्मणगढ़ (अलवर) कमलेश जैन
देवशयनी एकादशी, जिसे देव सोनी ग्यारस भी कहा जाता है, आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है। 6 जुलाई से भगवान विष्णु चार महीने के लिए योग निद्रा में चले जाऐगे । जिसके बाद चातुर्मास शुरू हो जाएंगे।
योग शिक्षक पंडित लोकेश कुमार ने बताया कि देवशयनी एकादशी को हरि शयनी एकादशी, आषाढ़ी एकादशी, या देव सैनी एकादशी भी कहा जाता है। इस दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में शयन करते हैं और कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को जागते हैं, जिसे देवउठनी एकादशी कहा जाता है। देवशयनी एकादशी का व्रत करने से जाने-अनजाने में किए गए पापों से मुक्ति मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है। देव शयनी एकादशी भगवान विष्णु, देवी लक्ष्मी और तुलसी की पूजा का भी विधान है।
देवशयनी एकादशी का महत्व:
- भगवान विष्णु के शयन में जाने का प्रतीक है।
- चातुर्मास की शुरुआत का प्रतीक है।
- शुभ और मांगलिक कार्यों पर रोक का प्रतीक है।
- व्रत रखने और पूजा करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।
- देवशयनी एकादशी सुबह स्नान करके पीले वस्त्र धारण करें।
- भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा करें।
- तुलसी के पत्ते को भोग में शामिल करें।
- एकादशी व्रत का संकल्प लें।
- धन, अनाज और वस्त्र का दान करें।
- देवशयनी एकादशी से भगवान शिव सृष्टि का संचालन संभालते हैं।
- चातुर्मास में विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन जैसे शुभ कार्य नहीं होते हैं।