तप के माध्यम से आत्मा राग द्वेष की मलिनताओ से परिशुद्ध होती है= आचार्य विनीत सागर महाराज
दश लक्षण महापर्व के सातवें दिन उत्तम तप धर्म की पूजा कर आत्म कल्याण और विश्व शांति की कामना की
डीग (नीरज जैन) जैन धर्म के दशलक्षण महापर्व के सातवें दिन डीग शहर के तीनों दिगंबर जैन मंदिरों में प्रातःकालीन बेला में बड़ी संख्या में जिनभक्त एकत्र होकर उत्तम संयम धर्म की पूजा एवं शांति धारा में सहभागी बने। जिन बिंबो पर कलशों से प्रवाहित पवित्र जलधारा के मध्य जब जिन वाणी के मंगल जाप गूँजे तो वातावरण आध्यात्मिक भावों से गूंज उठा। प्रत्येक श्रद्धालु के अंतर्मन से यही पुकार उठी कि आत्मकल्याण के पथ पर अग्रसर होकर विश्व में अहिंसा, सौहार्द और शांति का प्रसार हो।
श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर में आयोजित धर्मसभा में आचार्य श्री विनीत सागर महाराज ने सातवें दिन के प्रधान धर्म उत्तम तप का महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि तप कोई मात्र शारीरिक कष्ट सहना नहीं, बल्कि आत्मा को राग-द्वेष रूपी मलिनताओं से परिशुद्ध करना है। जब मनुष्य इन्द्रिय तृप्ति के क्षणिक सुखों से विमुख होकर साधना की अग्नि में स्वयं को तपाता है, तभी उसके भीतर जागृति का प्रकाश होता है। संयम और विवेक से युक्त तप ही वह सोपान है, जो जीव को संसार के बंधनों से मुक्त कर परम शांति की ओर ले जाता है।
महाराज श्री ने कहा कि उत्तम तप धर्म का सच्चा स्वरूप आंतरिक साधना है। उपवास, एकासन, आयंबिल आदि बाह्य विधियाँ तभी सार्थक होती हैं जब वह अंतरात्मा की निर्मलता के साथ जुड़ती हैं। तप हमें आत्मबल प्रदान करता है और वासनाओं की जंजीरों को ढीला कर मोक्षमार्ग की ओर प्रवाहित करता है। वास्तव में तप आत्मा का स्वर्ण है, जो त्याग और धैर्य की अग्नि में तपकर ही चमकता है।
उन्होंने सभा में उपस्थित श्रद्धालुओं को अपने जीवन में संयम, तपस्या और आत्मचिंतन के पथ पर चलने का संकल्प दिलाया । दशलक्षण महापर्व का यह दिन देर तक भक्ति, कीर्तन और साधना के रंग में डूबा रहा। वातावरण में गूँजते जयकारे और मंगलाचरण हर हृदय को यह स्मरण कराते रहे कि आत्मकल्याण का द्वार तप और संयम से ही खुलता है, और जब आत्मा निर्मल होगी, तभी जगत में शाश्वत शांति की स्थापना सम्भव है।


