क्रूर सिंह ने मंदसौर के मल को हराकर उज्जैनी की इज्जत बचाई महारानी पिंगला क्रूर सिंह की ओर हुई आकर्षित
खैरथल (हीरालाल भूरानी)
महाराजा भर्तृहरि नाटक में मंदसौर का सेनापति प्रस्ताव रखता है की प्रजा का खून बहने की अपेक्षा अगर किसी अन्य उपाय से हमारा आपसी झगड़ा समाप्त हो जाए तो क्या महाराज स्वीकार करेंगे इस पर प्रधान सचिव विद्यासागर के कहने पर कि इस प्रकार के मल युद्ध तो हमारे यहां परंपरा से होते आए हैं मुष्टिक चाणूरआदि मल को मथुरा पति कंसराज जीतकर लाए थे इसलिए हमेंयह प्रस्ताव स्वीकार कर लेना चाहिए ।
दोनों और केमलों का मल युद्ध होता है और उसमें उज्जैन के माल परास्त हो जाते हैं फिर क्रूर सिंह बने गुरु गोरखनाथ कहते हैं कि मुझे आज्ञा दीजिए एक्शन में मैं इस धरती पर सुला दूंगा और वह इस मल युद्ध को जीत लेते हैं इसी से आकर्षित होकर महारानी पिंगला उन्हें अपनी माला दे देती है और वह क्रूर सिंह को चाहने लगती है ।
आगे चंद्रशेखर शास्त्री वन में घोर तपस्या करके अमर फल राजा को देते हैं और राजा अमर फल को अपनी प्रियतम महारानी पिंगला को देते हैं और पिंगला अपने प्रेमी क्रूर को देती है और क्रूर यह कहते हुए की माना तू है रूपवती सूरत की भोली भाली है लेकिन ओ मतवाली नागिन भीतर से विष की प्याली है इस फल का आधा भाग तुझे नहीं मोहिनी को खिलाऊंगा और वह अमर फल मोहिनी को दे देता है मोहिनी अमर फल लेकर राज दरबार में जाती है और वह अमर फल राजा को दे देती है इस प्रकार इसका भेद खुलना है तो राजा भर्तृहरि भोग विलास से और महारानी पिंगला के प त्रिया चरित्र से आहत होकर वैराग्य की ओर मुड़ जाता है और वह राजपाट छोड़कर गुरु गोरखनाथ के पास दीक्षा लेने के लिए जाते हैं ।
मुख्य पात्रों में भरतरी हरी का प्रभावी अभिनय ललित मिश्रा ने गुरु गोरखनाथ क्रूर सिंह का अभिनय श्री हर्ष ने मोहिनी का अभिनय कुमारी गीता ने किया।


