भू राजस्व की तरह बकाया किराया नहीं, वसूल सकती नगर पालिका
इलाहाबाद (कमलेश जैन) हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि नगर पालिका द्वारा दुकान के किराये की बकाया राशि को भू-राजस्व के बकाये की तरह वसूल नहीं किया जा सकता। अदालत ने तहसीलदार, स्वार (रामपुर) द्वारा जारी वसूली प्रमाणपत्र को अवैध ठहराते हुए निरस्त कर दिया। हालांकि, न्यायालय ने स्पष्ट किया कि नगर पालिका कानून में उपलब्ध अन्य वैध माध्यमों से अपनी बकाया राशि की वसूली कर सकती है। यह आदेश न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने रहीश अहमद की याचिका पर दिया।
याचिकाकर्ता का कहना था कि वर्ष 1998 में नगर पालिका ने उन्हें दुकान आवंटित की थी, लेकिन उसका कब्जा वर्ष 2006 में मिला। इसके बावजूद वर्ष 1999 से नवंबर 2006 तक का किराया वसूलने के लिए तहसीलदार के माध्यम से लगभग 1.10 लाख रुपये की वसूली की कार्यवाही शुरू कर दी गई। दूसरी ओर, नगर पालिका का तर्क था कि बकाया किराया वसूली योग्य है और इसे सार्वजनिक धन की तरह वसूलने का अधिकार प्राप्त है।
केवल टैक्स की बकाया राशि ही वसूल सकती है नगर पालिका
खंडपीठ ने कहा कि उत्तर प्रदेश नगर पालिका अधिनियम, 1916 की धारा 173-ए के तहत केवल कर (टैक्स) की बकाया राशि को ही भू-राजस्व के बकाये के रूप में वसूला जा सकता है। दुकान का किराया कर नहीं, बल्कि संविदात्मक (अनुबंध आधारित) देयता है। इसी प्रकार उत्तर प्रदेश सार्वजनिक धन (बकाया की वसूली) अधिनियम, 1972 भी नगर पालिका के किराये के बकाये पर लागू नहीं होता, क्योंकि यह अधिनियम मुख्यतः ऋण, अग्रिम या वित्तीय सहायता जैसी देनदारियों के लिए बनाया गया है। अदालत ने अपने निर्णय में पूर्व के कई खंडपीठीय फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि नगर पालिका यदि किराये की राशि वसूलना चाहती है तो उसे कानून में उपलब्ध अन्य उपाय, जैसे दीवानी वाद, अपनाने होंगे। केवल वसूली प्रमाणपत्र जारी कर भू-राजस्व की तरह किराया वसूलना विधिसम्मत नहीं है। इसी आधार पर न्यायालय ने वसूली प्रमाणपत्र निरस्त कर दिया।

