मनरेगा का ‘जी-राम-जीकरण’: कमियों को यथास्थिति छोड़ नियमों को कमज़ोर करने की कवायद
लक्ष्मणगढ़ (अलवरकमलेश जैन) मनरेगा का नाम ही नही बदला गया है, बल्कि बहुत सारे ऐसे परिवर्तन किए गए हैं, जिन पर गंभीरता से विचार करना आवश्यक है।नए क़ानून में कई विरोधाभास साफ़ देखे जा सकते हैं। जिन कमियों में सुधार किया जाना था, उन्हें ज्यों का त्यों छोड़ दिया गया हैं और जिन नियमों को और मज़बूत करना था, उन्हें कमज़ोर बना दिया गया।
लक्ष्मणगढ़ कस्बे के एक बुजुर्ग का यह कहना, अकाल जैसी भीषण परिस्थितियों में अकाल राहत योजनाओं और मनरेगा के महत्व को प्रकट करता है। मगर, गौर करने लायक बात यह हैं इन इलाकों में मनरेगा को आज भी फेमन (अकाल राहत योजनाओं के लिए स्थानीय शब्द) और नरेगा (मनरेगा का शुरुआती नाम) के नाम से जाना जाता है, क्योंकि लोगों की रुचि योजना या कानून के नाम से ज्यादा उसका समुचित ढंग से लाभ उठाने में रही हैं।
पर, अबकी बार मनरेगा का नाम ही नही बदला गया है, बल्कि बहुत सारे ऐसे परिवर्तन किए गए हैं, जिन पर गंभीरता से विचार करना आवश्यक हो जाता है।
महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी कानून, 2005 (मनरेगा) को विकसित भारत- गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) कानून, 2025 द्वारा प्रतिस्थापित कर दिया गया है। दोनों कानूनों में अंतर शुरुआत से देखा जा सकता है।
मनरेगा की शुरुआत जहां ‘देश के ग्रामीण क्षेत्रों में गृहस्थियों की आजीविका की सुरक्षा हेतु… ‘ से होती थी, वहीं इस नए कानून की शुरुआत इन पंक्तियों से होती हैं – ‘विकसित भारत के राष्ट्रीय दृष्टिकोण (2047) के अनुरूप ग्रामीण विकास ढांचा स्थापित करने हेतु अधिनियम.’
यह शुरुआत इसलिए विशेष हैं क्योंकि इसमें विकसित भारत का जिक्र किया गया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हर मंच से विकसित भारत का ज्ञान मंत्र दोहराते हैं, जिसमे पहली प्राथमिकता में – गरीब (G), युवा (Y), अन्नदाता(A),नारी (N) सम्मिलित हैं। इसलिए, इस कानून का प्रारूप, मनरेगा से भिन्नता एवं इन चारो वर्गों पर संभावित प्रभाव जानना आवश्यक हैं।
पूर्ववर्ती मनरेगा में जहां काम करने को इच्छुक अकुशल-श्रमिक को मांग के आधार पर एक साल में न्यूनतम 100 दिन का कार्य उपलब्ध करवाने का प्रावधान था, वहीं इस कानून में वो दिन बढ़ाकर 125 कर दिए गए हैं। मगर इसमें दो परिवर्तन किए गए हैं – पहला, यह कार्य सिर्फ केंद्र सरकार द्वारा चिह्नित क्षेत्रों में ही उपलब्ध करवाया जाएगा। यह मनरेगा के ‘ग्रामीण सार्वभौमिकता’ के गुण के विपरीत है।
दूसरा, इसी एक्ट में राज्य सरकारों को निर्देशित किया गया हैं कि साल में वो 60 दिन ध्यान में लाए, जिस दौरान कृषि कार्य चरम पर रहता हो, ताकि उस अवधि में चल रहे कार्यों को बंद किया जा सके। इस नियम-बदलाव के पीछे कृषि कार्यों हेतु पर्याप्त मजदूर उपलब्ध करवाने का तर्क दिया गया है।ये परिवर्तन प्रथमदृष्टया उचित लग सकते हैं, मगर मनरेगा के ग्रामीण अनुभव तथा व्यापक प्रभावों पर विचार करते हुए इस कानूनी परिवर्तन की कमियां व समस्याएं समझ आती हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में मनरेगा ने व्यापक और सकारात्मक परिवर्तन किए। अकाल और तंगी के कारण सुदूर शहरों की ओर होने वाला पलायन बड़े पैमाने पर रुका। लोगों को जीवन-यापन के लिए सहजता से रोजगार उपलब्ध हुआ। कई क्षेत्रों मसलन- राजस्थान के गांवों में 2011 में मनरेगा के कारण ‘रिवर्स-माइग्रेशन’ भी संभव हुआ। पलायन के संकट से निपटने के साथ ही मनरेगा ने ग्रामीण गरीबों के लिए बेहतर मजदूरी के अवसर भी पैदा किए। कम मजदूरी और ज्यादा काम के कारण शोषित होने वाले शोषित मजदूर मनरेगा के कारण अपनी मजदूरी की सही कीमत मांगने लायक बने। विभिन्न शोध भी मनरेगा एवं मजदूरी के परस्पर सकारात्मक संबंधों पर मोहर लगाई हैं।
अन्नदाता की परिभाषा में सिर्फ बड़े जमींदारों को शामिल करना, दलितों-मजदूरों के उस बड़े तबके का अपमान है, जो सही मायने में अनाज उपजाने के लिए दिन-रात पीसता है । मनरेगा ने इन्हें केवल रोजगार नही दिया बल्कि कृषि कार्यों के समय अपने श्रम का समुचित मोल-भाव करने लायक बनाया। इस प्रवृति ने ग्रामीण समुदाय में बराबरी, श्रम के सम्मान और आत्मचेतना के मूल्य प्रदान किए हैं। ऐसे में खेती के समय 60 दिनों के लिए कार्यों को रोक देना, दलित-मजदूरों के लिए पुनः शोषण के उन्ही दरवाजों को खोल देना हैं, जिन्हें बड़े यत्न से बंद किया गया था।

